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देश का इकलौता हाथी गांव! जानिये कैसी है वहां खुशरंग जिंदगी, अनूठे प्रेम की दास्तां है यह

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द फॉलोअप टीम, जयपुर:
वन्यजीवों में हाथी और इंसानों का रिश्ता सबसे अलग है, सदियों से लेकर आजतक हाथी और इंसानों के बीच खूबसूरत रिश्ता दिखाई देता है। इंसानों का ऐसा तालमेल किसी अन्य वन्यजीव के साथ कभी नहीं रहा है। हाथी राजाओं की सबसे पसंदीदा सवारी हुआ करता था और युद्ध के समय में भी राजा हाथी पर बैठ कर ही युद्ध करना पसंद करते थे। राजा-महाराजों के लिए हाथी सबसे ज्यादा पसन्द की जाने वाली सवारी रहा है। आज भी आमेर के किले में हाथी की सवारी का पर्यटक खूब लुफ्त उठाते हैं। राजस्‍थान के आमेर में होने वाली हाथी की सवारी पूरी दुनिया में फेमस है। ल्र्किन कोरोना काल में हाथियों की सवारी पर लॉक लग गया था। कोरोना महामारी के दौर में जयपुर के पास आमेर में जयपुर-दिल्ली हाईवे पर बसा देश का इकलौता हाथी गांव बुधवार को मुस्कुरा उठा। 



रोजी-रोटी बंद थी 
यहां महावतों और हाथी मालिकों के चेहरे इसलिए ख़ुशी से खिल उठे क्योंकि दो महीने बाद हाथी सवारी पर लगा लॉक मंगलवार शाम को हटा दिया गया।  17 अप्रैल से आमेर में हाथी सवारी बंद थी। बुधवार की सुबह फिर से सजे-धजे हाथी महावतों के साथ पर्यटकों को सैर करवाने के लिए आमेर महल के हाथी स्टैंड पर पहुंचे। एक बड़े तालाब में हथिनी लक्ष्मी को नहलाते हुए महावत नजर आए। सबके चेहरों पर चमक थी। लक्ष्मी को तालाब में सुबह 6 बजे से नहला रहे थे ताकि उसे पर्यटकों के स्वागत में खड़ा कर सकें। खुशी के पीछे उनका दर्द भी छिपा था। जो उन्होंने लॉकडाउन में सहन किया। काम बंद होने से उनकी  रोजी रोटी पर भी आफत आ गयी थी। 



हाथियों को पालना आसान नहीं 
महावतों का कहना है कि एक तरफ कोरोना संक्रमण का डर  तो दूसरी तरफ इससे सबसे बड़ा संकट हाथी मालिकों के लिए था हाथियों का भोजन उसका रख रखाव। 100 महावतों के के पास करीब 85 हाथी है। हाथियों को पालने के लिए जेवर गिरवी रख दिए। घर भी बेच दिया। लाखों रुपए का कर्ज भी उधार ले लिया गया क्योंकि हाथियों को खिलाना आसान बात नहीं है। उनका आहार बहुत अधिक होता है। साथ ही महावतों को अपने परिवार का भी पेट पलाना था ऐसे में दो बार इतने लंबे समय के लॉक डाउन ने गरीब परिवारों की कमर तोड़ कर रख दी।