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रक्षाबंधन पर सखी मंडल की महिलाएं बना रही हैं आकर्षक राखियाँ, बढ़ा रहे हैं स्वरोजगार के अवसर

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द फॉलोअप डेस्क
रक्षाबंधन के पावन अवसर पर झारखंड की ग्रामीण महिलाएं पारंपरिक और जैविक सामग्रियों से सुंदर राखियाँ तैयार कर रही हैं, जो इस बार विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। राज्य के विभिन्न जिलों—रांची, हजारीबाग, पलामू, गिरिडीह, धनबाद, कोडरमा और खूंटी में JSLPS के सहयोग से सखी मंडल की महिलाएं राखी निर्माण कर रही हैं। उन्हें प्रशिक्षण देकर ‘पलाश’ ब्रांड के तहत अपने उत्पादों को बाजार तक पहुँचाने का मंच प्रदान किया गया है। इससे न केवल उन्हें स्वरोजगार का अवसर मिल रहा है, बल्कि आत्मनिर्भरता और आर्थिक मजबूती की ओर भी एक ठोस कदम उठाया गया है।

इन महिलाओं द्वारा बनाई जा रही राखियाँ पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल और पारंपरिक सामग्रियों से बनी होती हैं। धान, चावल, मौली, सूती और रेशमी धागे, बुरादा, हल्दी, मोती आदि जैसी सामग्रियों से तैयार की गई 20 से 25 तरह की हस्तनिर्मित राखियाँ स्थानीय बाजारों में विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। ‘पलाश’ ब्रांड के जरिए इन महिलाओं को एक नई पहचान मिली है और उनकी आय में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी जा रही है। यह पहल पारंपरिक शिल्प को जीवित रखने और ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक प्रेरणादायी कदम है।

खूंटी जिले की सखी मंडल से जुड़ी महिलाएं इस वर्ष ‘अदिवा’ ब्रांड के तहत विशेष प्रकार की चांदी और ऑक्सीडाइज़्ड राखियाँ बना रही हैं। इन राखियों की कीमत ₹150 से ₹200 (ऑक्सीडाइज़्ड) और ₹800 से ₹1200 (चांदी) तक है। इन डिज़ाइनों में पारंपरिक कला और आधुनिक आकर्षण का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है, जिससे ये राखियाँ उपभोक्ताओं के बीच खासा पसंद की जा रही हैं। ये राखियाँ रांची के हेहल स्थित जेएसएलपीएस कार्यालय में संचालित पलाश मार्ट और राज्य के अन्य जिला मुख्यालयों में विशेष स्टॉल के माध्यम से बिक्री के लिए उपलब्ध हैं।

‘पलाश ब्रांड’ को ग्रामीण उत्पादों के लिए एक मजबूत पहचान के रूप में देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा सितंबर 2020 में लॉन्च किए गए इस ब्रांड के अंतर्गत अब तक 30 से अधिक उत्पाद बाजार में लाए जा चुके हैं। पिछले वर्ष गोड्डा, पलामू, बोकारो, सिमडेगा और धनबाद जिलों की 115 सखी मंडल इकाइयों ने राखियों की बिक्री से लगभग ₹10 लाख की आमदनी की थी। इस वर्ष भी महिलाओं को बेहतर बिक्री और आमदनी की आशा है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिला भागीदारी को नई दिशा दे रही है।

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