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डीजीपी नियुक्ति में देरी पर सुप्रीम कोर्ट हुआ सख्त, कहा- नहीं चेलेगी बहानेबाजी; दिया इन नियमों का हवाला 

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रांची/नई दिल्ली 
देश के विभिन्न राज्यों में पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्ति में हो रही देरी और ढुलमुल रवैये पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि डीजीपी की नियुक्ति के मामले में बहानेबाजी नहीं चलेगी और 2006 के ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ फैसले का पालन अनिवार्य है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पंजाब और पश्चिम बंगाल सरकारों की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी राज्य के पास प्रकाश सिंह फैसले के अनुरूप कोई वैध कानून नहीं है, तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश ही लागू रहेंगे और उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।
पंजाब सरकार द्वारा डीजीपी नियुक्ति के लिए यूपीएससी पैनल की सिफारिशों को नहीं मानने पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए राज्य को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने पूछा है कि यूपीएससी द्वारा सुझाए गए नामों को मंजूरी न देने पर राज्य के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए।


सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल को लेकर भी अदालत ने टिप्पणी की। जब राज्य की ओर से यूपीएससी को रिपोर्ट सौंपे जाने की जानकारी दी गई, तो मुख्य न्यायाधीश ने कटाक्ष करते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार अपने डीजीपी को राज्यसभा भेजने में काफी व्यस्त रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अब वहां जल्द एक स्थायी डीजीपी की नियुक्ति होगी।
वहीं तमिलनाडु सरकार को इस मामले में राहत मिली है। राज्य की ओर से कोर्ट को बताया गया कि डीजीपी नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और योग्य अधिकारियों के नाम यूपीएससी को भेज दिए गए हैं। एम्पैनलमेंट कमेटी की बैठक 20 मार्च को होगी, जिसके बाद पैनल तैयार किया जाएगा। इस प्रगति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव के खिलाफ चल रही अवमानना याचिका बंद कर दी।


गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ मामले में पुलिस सुधारों को लेकर अहम दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसके तहत डीजीपी की नियुक्ति योग्यता और पारदर्शिता के आधार पर की जानी चाहिए। राज्य सरकार यूपीएससी को वरिष्ठ अधिकारियों की सूची भेजती है, जिनमें से यूपीएससी तीन नामों का पैनल तैयार करता है। साथ ही डीजीपी का कार्यकाल कम से कम दो वर्ष तय किया गया है, ताकि वे बिना किसी राजनीतिक दबाव के स्वतंत्र रूप से काम कर सकें।

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