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परंपरा से प्रगति तक: GI टैग से नई ऊंचाई पर पहुंचेगा भगैया तसर सिल्क 

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द फॉलोअप डेस्क 

गोड्डा के भगैया तसर सिल्क, अपनी उत्कृष्ट बनावट और प्राकृतिक चमक के लिए जाना जाता है। GI टैग मिलने के बाद न केवल कारीगरों को उनके हस्तनिर्मित सिल्क साड़ियों और कालीनों का उचित मूल्य मिलेगा, बल्कि बिचौलियों की भूमिका भी कम होगी। इससे सिल्क उत्पादों की अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडिंग और मार्केटिंग में आसानी होगी। वहीं गोड्डा जिला के प्रसिद्ध भगैया सिल्क को भौगोलिक संकेत (GI) टैग मिलने का रास्ता साफ हो गया है। इस पहल से जिले के 20 हजार से अधिक बुनकर सीधे लाभान्वित होंगे। जीआई टैग प्रमाणन से भगैया सिल्क को वैश्विक पहचान, कानूनी सुरक्षा और बेहतर आर्थिक मूल्य प्राप्त होगा।

फाउंडेशन के सचिव अमलेश कुमार सिंह ने बताया कि GI टैग से बुनकरों की वैश्विक पहचान बढ़ेगी और यह पारंपरिक कला के संरक्षण तथा ग्रामीण महिला कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक होगा। गोड्डा जिले के ठाकुरगंगटी प्रखंड के भगैया, खुटहरी, माल तेतरिया और मानिकपुर पंचायतों में 20 हजार से अधिक बुनकर परिवार सिल्क कारोबार से जुड़े हैं। नाबार्ड की ओर से फाउंडेशन को REPO (रूरल एंटरप्रेन्योर प्रोमोशन ऑर्गनाइजेशन) के गठन की भी स्वीकृति दी गई है, जिससे तसर सिल्क की वैल्यू चेन और मजबूत होगी और कारीगरों को बेहतर प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध होगा। इस पहल से स्थानीय सिल्क उद्योग को नई ऊंचाई मिलेगी और झारखंड का यह प्रीमियम उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त करेगा।

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