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अभिनय से हर भूमिका में 'प्राण' फूँक देनेवाले फ़नकार की जिंदगी के धूप-छांव को जानिये

12 फ़रवरी,1920 को पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में बसे एक रईस परिवार में प्राण साहब का जन्म हुआ। बचपन में उनका नाम 'प्राण कृष्ण सिकंद' था।

बिहार में बाहुबली-4: और फिर इस तरह झोपड़ी में जलकर सम्राट की दंतकथा का अंत हुआ

'भागाभागी के दौरान बचने के लिए सब एक झोपड़ी में घुस गए और चूंकि अंदर से लगातार फायरिंग कर ही रहे थे सो गांववालों ने झोंपड़ी में आग लगा दी और इस तरह झोंपड़ी के अंदर लोग जल कर मर गए।

पहले भारतीय विमान के अपहरण का कश्‍मीर और राजनीति से क्‍या था कनेक्‍शन

'भारतीय प्रधानमंत्री की बड़ी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा जिसने राजीव गांधी और कश्मीर को बचाया और उपमहाद्वीप का इतिहास बदल दिया था।

अफगानिस्तान के ताजा हाल, चीन समेत पांच पड़ोसी देशों की क्‍यों उड़ चुकी है नींद

रूसी नेतृत्व को भ्रम था कि तालिबान उनके ताबेदार हो गये। तीन दिन पहले तालिबान द्वारा तबाही बरपाने वाले रुख को देखकर रूस और तुर्की ने उत्तरी अफगानिस्तान के मजारे शरीफ में अपने वाणिज्य दूतावास बंद कर दिये।

बिहार में बाहुबली-3: डॉन की जब दीवानी हुई एक लड़की और चुनावी टिकट में लालू यादव की अड़चन की कथा

आधे घंटे की मुलाकात में पहली और आखिरी बार ए के 47 को हाथ में लेकर देखने का रोमांच

पानी की सतह पर बसी खुशुनमा दुनिया की सैर, चाय से लेकर सब्‍जी तक

' डल लेक के भीतर की वो दुनिया, जो टूरिस्टों की पहुँच से दूर

उस गुरु फिल्‍मकार की कहानी जिसे चौदहवीं के चांद में कागज़ के फूल भी मोह लेते रहे

गुरु दत्त की बेचैनी ने उनकी फिल्मों को अमरता दी और उन्हें मौत

बिहार में बाहुबली-2: कैसे बच निकले सूरजभान सिंह और कब चुकाया सम्राट ने पहला बदला

'बेगूसराय के सम्राट ने गंगा के पानी पर खींची थी अपने साम्राज्य की लकीर और जानिये सम्राट का इकलौता बदला

किताबों ने खोलीं जिंदगी और जहान की खिड़कियां, एक लेखक से जानिये कोर्स से अलग भी पढ़ना कितना जरूरी

'बचपन याद आता है, लगभग चार-पाँच साल से, तब से एक बात बहुत शिद्दत से याद आती है कि मुझे पढ़ने का बहुत शौक हुआ करता था

बिहार में बाहुबली-1: सबसे पहले कैसे पहुंची ए के 47 राइफल, जानिये अशोक शर्मा के सम्राट बनने की कहानी

''अशोक सम्राट बेगूसराय की रंगदारी के इतिहास के मिथकीय पुरुष की हैसियत रखते थे। उनके संबंध में ढेरों किस्से-कहानियाँ तब भी चलतीं थीं बैठकियों में, आज भी चलती हैं। उनके जलवे का कालखंड 87-88 से लेकर 94-95 तक रहा। इस दौरान उन्हें कमोबेश एकीकृत बिहार (जिसमें झ

क्‍यों नहीं सुलझ पा रहीं 'आत्‍महत्‍या' के कारणों की गुत्थियां, बता रहे हैं मनोचिकित्‍सक

आत्महत्या करना कायरता है या यह हिम्मत वालों का काम है? इस पर भी कई कई दिनों तक बहस की जा सकती है।

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