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नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले पर आनंद मोहन ने उठाए सवाल, कहा - ‘ये बात गले नहीं उतरती’

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द फॉलोअप डेस्क 

बिहार के ताजा राजनीतिक घटनाक्रम पर पूर्व सांसद आनंद मोहन ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि यह निर्णय आम लोगों को समझ में नहीं आ रहा है और इससे व्यापक असंतोष पैदा हुआ है। मीडिया से बातचीत करते हुए आनंद मोहन ने कहा कि यह मानना मुश्किल है कि यह पूरी तरह मुख्यमंत्री की निजी इच्छा है। उन्होंने कहा, फैसला थोपा गया हो या स्वयं लिया गया हो, मैं और मेरे जैसे लाखों लोग इससे पूरी तरह असहमत हैं। उन्होंने आगे कहा कि हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में जनता से “फिर से नीतीश” के नाम पर वोट मांगे गए थे, लेकिन कुछ ही महीनों में ऐसा फैसला लिया जाना लोगों के विश्वास को ठेस पहुंचाता है। इसे उन्होंने “राजनीतिक विश्वासघात” और “वादाखिलाफी” करार दिया।

आनंद मोहन ने दावा किया कि इस घटनाक्रम से पिछड़े, अतिपिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों में आक्रोश और असंतोष का माहौल है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस फैसले से केवल जेडीयू ही नहीं, बल्कि भाजपा को भी राजनीतिक नुकसान हो सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि नीतीश कुमार अब राज्यसभा की भूमिका में सक्रिय होते हैं, तो पार्टी के बड़े फैसले सीधे उनके नेतृत्व में होने चाहिए और संगठनात्मक ढांचे को उसी अनुसार मजबूत किया जाना चाहिए। पूर्व सांसद आनंद मोहन ने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे जिन कथित रणनीतिकारों और योजनाकारों की भूमिका रही है, उससे न केवल जेडीयू की छवि को नुकसान पहुंचा है, बल्कि भाजपा को भी राजनीतिक रूप से हानि उठानी पड़ सकती है।

उनके अनुसार, आम जनता इसे एक राजनीतिक प्रपंच के रूप में देखेगी, जिसका लाभ विपक्ष को मिल सकता है। उन्होंने आगे कहा कि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने और चौथी बार राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने की स्थिति में पार्टी में किसी कार्यकारी अध्यक्ष की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। सभी बड़े फैसले सीधे उनके नेतृत्व में ही लिए जाने चाहिए, तभी पार्टी की संभावनाएं मजबूत बनी रहेंगी। अन्यथा, षड्यंत्रों से असंतुष्ट लोग समान विचारधारा वाली पार्टियों की ओर रुख कर सकते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि निशांत और उनकी युवा टीम ने नई उम्मीदें जगाई हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “उपमुख्यमंत्री का मतलब चुप मुख्यमंत्री नहीं होना चाहिए। यदि नेतृत्व देना है, तो स्पष्ट रूप से मुख्यमंत्री बनाया जाए, तभी जनता के बीच एनडीए की साख बनी रहेगी।”

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