द फॉलोअप डेस्कः
राजस्थान के बाड़मेर का मेली गांव करीब 300 परिवार दलित मेघवाल समाज के हैं। मेघवाल समाज में ही किसी की शादी है। लेकिन एक परिवार को इस शादी में न्योता नहीं दिया गया है, क्योंकि उस परिवार ने गांव के नियम के खिलाफ जाकर समाज में बदलाव लाने की कोशिश की है। समाज में हीन भावना की दृष्टि से शंकरराम मेघवाल के परिवार को देखा जा रहा है, इससे वह अपमानित महसूस कर रहे हैं। दरअसल गांव के ही शंकर राम मेघवाल की बहनों की फरवरी में शादी थी। लड़कियां जब दुल्हन बनीं तो उनकी बिंदोली घोड़ी पर निकाली गई। इसके बाद शंकर को समाज से बहिष्कार कर दिया गया। पंचायत ने कहा कि ने बताया है कि उनकी आठ बहनें हैं। छह बहनों की शादी हो चुकी है। शंकर ने अपनी सभी बहनों को बहुत नाजों से पाला है। आखिरी दो बहनों की शादी में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहता था। इसलिए सजे-धजे दो घोड़े बुलवाए। गाजे-बाजे के साथ 23 साल की लक्ष्मी और 22 साल की दीपू की बिंदोली निकाली गई। शादी 7 फरवरी को थी। दोनों बहनों को विदा कर दिया गया। इस तरह की शादी के जश्न में पूरा गांव और समाज शामिल हुआ। यही बदलाव मुसीबत बन गया।

मां ने कहा नहीं देना है दंड
दरअसल राजस्थान में दलित मेघवाल समुदाय की शादियों में लड़कियां घोड़ी नहीं चढ़ती हैं। इस इलाके में ऐसा पहली बार हुआ, जब दलित बेटियों ने घोड़ी पर अपनी बिंदोली निकाली थी। शंकर खुश था कि वह समाज में संदेश दे रहे हैं कि लड़के और लड़कियों में हम कोई भेद नहीं करते हैं। बहनों की शादी को 2 महीने से ज्यादा समय बीत गया। इसी बीच 18 अप्रैल को दलित मेघवाल समाज के पंचों ने शंकर को बुलाया। उसे कहा कि बहनों की बिंदोली तुमने घोड़ी पर निकाली इसिलए तुम्हें दंड भऱना होगा। अगर नहीं भरा तो समाज से तुम्हारे परिवार का बहिष्कार होगा। शंकर की पत्नी रेखा कहती हैं कि जब मेरी ननदें घोड़ी चढ़ी थीं तब पूरा समाज शामिल हुआ था जश्न में और अचानक 2 महीने के बाद याद आया कि हमने गलत किया है। इधर शंकर की मां कहती है कि ‘जब हमने कोई छोटा काम नहीं किया है, तो हम दंड क्यों भरें। बेटियों को बेटों के बराबर मानना गलत नहीं है। जब मैंने अपनी बेटियों के साथ भेदभाव नहीं किया तो ये समाज कैसे कर सकता है?’
हमारे वाट्सअप ग्रुप से जुड़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : http://https://chat.whatsapp.com/EUEWO6nPYbgCd9cmfjHjxT