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पड़ताल : रघुवर कार्यकाल में बैन हुआ PFI कैसे हुआ सक्रिय, रांची हिंसा में क्या है भूमिका! 

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डेस्क: 

रांची में हुई हिंसा को पांच दिन बीत चुके हैं। रांची पुलिस की जांच में सामने आया है कि इस पूरी हिंसा और उपद्रव की साजिश पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई ने रची थी। यूपी सहित दूसरे राज्यों से आए पीएफआई के सदस्यों ने रांची के स्थानीय युवकों के साथ मिलकर पूरी प्लानिंग की थी। दैनिक हिंदी अखबार दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक रांची पुलिस का दावा है कि रांची में अमन और शांति में खलल डालने के लिए उत्तर प्रदेश से बकायदा फंडिंग की गई थी। जांच में पता चला है कि पीएफआई के सदस्यों ने ही स्थानीय युवकों को जुम्मे की नमाज के बाद लोगों को भड़काया और पत्थरबाजी कराई। 

वासेपुर गैंग्स नाम का व्हाट्सएप ग्रुप
जांच से पता चला है कि वासेपुर गैंग्स नाम का एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया गया था। इस व्हाट्सएप ग्रुप को साजिश को अंजाम देने के लिए इस्तेमाल किया गया । इसी के जरिए लोगों को इकट्ठा होने का मैसेज दिया गया। इस व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए बीजेपी की निलंबित राष्ट्रीय प्रवक्ता नुपूर शर्मा की तस्वीर सर्कुलेट की गई। इसी व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए ही लोगों को बताया गया कि उनको कब, कहां औऱ कैसे पूरी साजिश को अंजाम देना है। पुलिस अब एक-एक कर सभी कड़ियां जोड़ रही है ताकि मामले की तह तक पहुंचा जा सके।

दरअसल, ना केवल रांची हिंसा बल्कि बीते कुछ समय से देश के अलग-अलग राज्यों में हुए कई दंगों में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का नाम सामने आया है। यही नहीं, सीएए एनआरसी के खिलाफ देशभर में हुए प्रदर्शनों में भी पीएफआई का नाम ही सामने आया था। इस वीडियो स्टोरी में इस संगठन के बारे में सबकुछ जानेंगे, उससे पहले एक और चिंताजनक तथ्य पर चर्चा करेंगे जो पीएफआई और झारखंड से जुड़ा है।

 

चुनावी राजनीति में पीएफआई की दखल
दैनिक भास्कर सहित कुछ अन्य अखबारों में छपी रिपोर्ट के मुताबिक पीएफआई, झारखंड में चुनावी राजनीति के जरिए भी दाखिल हो रहा है। खुफिया एजेंसियों ने इस बाबत केंद्र सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी है। रिपोर्ट के मुताबिक पीएफआई समर्थित कम से कम 48 लोगों ने हालिया पंचायत चुनाव में जीत हासिल की है। ये सभी संताल परगना के हैं। रिपोर्ट के मुताबिक साहिबगंज के बरहड़वा और पतना इलाके में पीएफआई ने अपने समर्थकों को अलग-अलग पदों पर चुनाव लड़वाया था। इनमें से 48 ने जीत हासिल की। रिपोर्ट बताती है कि पीएफआई संताल परगना के अलग-अलग जिलों में बीते 3 साल से सक्रिय है।

 
पीएफआई समर्थकों का विस्तार साहिबगंज, दुमका, बरहड़वा, पतना और उधवा में है। पीएफआई जामताड़ा और गोड्डा जैसे जिलों में भी विस्तार की फिराक में है। इन जिलों में भी पंचायत चुनाव में पीएफआई ने अपने समर्थकों को चुनावी मैदान में उतारा था लेकिन उतनी कामयाबी नहीं मिली। 

संताल परगना के इन इलाकों में सक्रियता
खुफिया विभाग की रिपोर्ट बताती है कि पंचायत चुनाव में पीएफआई समर्थकों को उतारने को लेकर कई बैठकों का आयोजन किया गया। पश्चिम बंगाल सहित कई अन्य राज्यों से आये पीएफआई के एक्टिव मेंबर्स ने पंचायत चुनाव की रणनीति बनाई थी। बैठकों में उग्रवादी संगठनों के भी हिस्सा लेने की खबर है। कहा जाता है कि पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में पीएफआई काफी मजबूत स्थिति में। वहां से झारखंड में संगठन का विस्तार हो रहा है जो सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक है। 

मार्च 2019 से ही राज्य में प्रतिबंधित है पीएफआई
पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई झारखंड में भी प्रतिबंधित है। सबसे पहले 21 फरवरी 2018 को झारखंड में इस संगठन पर बैन लगाया गया। संगठन के सदस्य इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट चले गये। हाईकोर्ट ने 27 अगस्त 2018 को बैन हटा दिया लेकिन राज्य सरकार से कहा कि वो कुछ खामियों को दूर करके दोबारा संगठन पर प्रतिबंध लगा सकती है।

बाद में तकनीकी खामियों को दूर करके राज्य सरकार ने मार्च 2019 में पीएफआई पर दोबारा प्रतिबंध लगा दिया। तो, पीएफआई और इसकी गतिविधियों पर झारखंड में बैन लगा हुआ है। बावजूद इसके, पीएफआई के समर्थकों का पंचायत चुनाव में जीत हासिल करना और रांची हिंसा में संगठन का नाम सामने आना, सुरक्षा के लिहाज से काफी चिंताजनक है। 

पीएफआई पर प्रतिबंध क्यों लगाया गया था
सवाल है कि आखिरकार पीएफआई पर प्रतिबंध क्यों लगाया गया। क्यों ये संगठन सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक है। दरअसल, कहने को तो पीएफआई खुद को अल्पसंख्यकों का हितैषी बताता है। कहता है कि वो मुस्लिम समाज के हित और अधिकार की बात करता है लेकिन सच्चाई ये है कि पीएफआई एक कट्टर इस्लामिक संगठन जो उग्रवाद को बढ़ावा देता है।

इस सगंठन का मूल वैसे तो 1993 में बाबरी विध्वंस के बाद गठित नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट में छिपा है। 2006 में यही संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई के रूप में सामने आया। संगठन मूलरूप से केरल से संचालित है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने एक रिपोर्ट में बताया है कि पीएफआई 23 राज्यों में सक्रिय है। हालिया कानपुर हिंसा में भी पीएफआई का नाम ही सामने आया था। कहा तो ये भी जाता है कि केरल से पीएफआई के कई सदस्यों ने सीरिया जाकर आईएसआईएस से ट्रेनिंग ली। 

कुल मिलाकर। रांची हिंसा में पीएफआई का मास्टरमाईंड के रूप में सामने आना। पंचायत चुनाव के जरिए राजनीति में दखल और सदस्यों की बढ़ती संख्या। राज्य की सुरक्षा के लिए काफी चिंताजनक है। देखना होगा कि सरकार का स्टैंड क्या होगा।