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70 साल के सर्वेश्वर हेम्ब्रम ने बंजर जमीन को पसीने से सींचकर उपजाऊ बनाया, बने सफल किसान

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जामताड़ा:

कहते हैं कि मेहनत और सच्ची लगन कभी विफल नहीं होती। इसका जीवंत उदाहरण पेश किया है जामताड़ा प्रखंड के बेवा कमारडीह गांव निवासी 70 वर्षीय सर्वेश्वर हेंब्रम ने। उम्र के इस पड़ाव पर भी सर्वेश्वर ने अपनी कड़ी मेहनत और खेती के दम पर न केवल गरीबी को मात दी, बल्कि समाज में बेटियों को लेकर बनी संकीर्ण सोच को भी आईना दिखाया है।

​गरीबी में छूटी पढ़ाई, पर बेटियों को बनाया 'बेटा'
सर्वेश्वर की जीवन यात्रा संघर्षों से भरी रही। छठी कक्षा में थे तभी पिता का साया सिर से उठ गया। आर्थिक तंगी के कारण जैसे-तैसे मैट्रिक तक की पढ़ाई पूरी की, लेकिन आगे का रास्ता बंद हो गया। शादी के बाद उनके घर 3 बेटियों ने जन्म लिया। बेटा न होने पर समाज के तानों की परवाह किए बिना सर्वेश्वर ने अपनी तीनों बेटियों को बेटों से बढ़कर पाला। मजदूरी और खेती के संघर्ष के बीच उन्होंने ठान लिया था कि जो कमी उनके जीवन में रह गई, वह बेटियों के साथ नहीं होने देंगे।

2 बेटियां सरकारी सेवा में और तीसरी तैयारी में जुटीं
​सर्वेश्वर की मेहनत का फल आज सबके सामने है। उनकी तीनों बेटियां स्नातक (ग्रेजुएट) हैं। बड़ी और मझली बेटी अपनी काबिलियत के दम पर सरकारी नौकरी कर रही हैं, वहीं तीसरी बेटी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में जुटी है। गर्व की बात यह है कि उनकी दोनों बड़ी बेटियों के पति भी सरकारी सेवा में कार्यरत हैं। आज यह परिवार पूरे जिले के लिए मिसाल बन चुका है।

​3 एकड़ बंजर भूमि को बनाया उपजाऊ
​सर्वेश्वर ने अपने एक सहयोगी के साथ मिलकर लगभग 3 एकड़ बंजर भूमि को कड़ी मशक्कत से खेती योग्य बनाया। वर्तमान में वे मकई, बैंगन, टमाटर और झींगा जैसी फसलों की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। कृषि विभाग ने उनकी लगन को देखते हुए उन्हें सोलर प्लांट उपलब्ध कराया है, जिससे सिंचाई में मदद मिल रही है। 70 वर्ष की आयु में भी वे रोजाना साइकिल से कई किलोमीटर का सफर तय करते हैं और खेतों में पसीना बहाते हैं।

​प्रशासन से सिंचाई की गुहार
अपनी सफलता को विस्तार देने के लिए सर्वेश्वर ने अब विभाग से सिंचाई की बेहतर सुविधा की मांग की है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में वे पास के तालाब पर निर्भर हैं, जिसके सूखने पर खेती में बाधा आती है। उन्होंने मांग की है कि यदि उन्हें डीप बोरिंग या अन्य सिंचाई साधन उपलब्ध कराए जाएं, तो वे और भी बड़े पैमाने पर उत्पादन कर सकेंगे।

​सर्वेश्वर हेंब्रम की यह कहानी न केवल एक किसान की सफलता है, बल्कि उन अभिभावकों के लिए एक संदेश है जो बेटियों को बोझ समझते हैं। आज सर्वेश्वर की देखा-देखी गांव के अन्य किसान भी आधुनिक खेती की ओर प्रेरित हो रहे हैं।

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