द फॉलोअप डेस्क
केंद्रीय महिला एवं बाल समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित आंगनबाड़ी केंद्रों और वहां कार्यरत सेविकाओं की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। राज्य भर में आंगनबाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं को महीनों से न तो मानदेय मिल रहा है और न ही पोषाहार व अन्य मदों की राशि का भुगतान हो पा रहा है। पहले से ही बेहद कम मानदेय पर काम कर रहीं सेविकाओं को समय पर भुगतान न होने के कारण गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। जानकारी के अनुसार सेविकाओं के मानदेय में केंद्र सरकार के हिस्से का भुगतान नवंबर महीने से लंबित है, जबकि राज्य सरकार का भुगतान अक्टूबर से बकाया है। इसके अलावा पोषाहार और अन्य मदों की राशि भी लंबे समय से अटकी हुई है। पोषाहार की राशि का भुगतान जुलाई महीने से नहीं हो पाया है। ऐसे में आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों को मिलने वाला पोषण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

सेविकाओं का कहना है कि पोषाहार की राशि न मिलने के कारण उन्हें मजबूरी में अपने घर से पैसा लगाकर बच्चों को भोजन उपलब्ध कराना पड़ रहा है। वहीं पोषाहार से जुड़ी सामग्री की दरें बाजार मूल्य से काफी कम निर्धारित की गई हैं, जिससे गुणवत्तापूर्ण पोषण उपलब्ध कराना और भी कठिन हो गया है। कई सरकारी घोषणाओं के तहत मिलने वाली राशि भी महीनों से नहीं दी गई है। कम मानदेय में काम कर रहीं सेविकाओं पर केंद्र और राज्य सरकार की तमाम योजनाओं को जमीन पर उतारने का दबाव है। इसके साथ ही उन्हें चुनाव आयोग द्वारा बीएलओ का कार्य भी सौंपा जाता है। यदि बीएलओ का काम सही तरीके से नहीं किया जाता है तो चुनाव आयोग की ओर से कार्रवाई का डर बना रहता है, वहीं सरकारी योजनाओं में देरी होने पर विभागीय अधिकारियों का दबाव झेलना पड़ता है। इस तरह सेविकाएं चुनाव आयोग और सरकारी विभागों के बीच पेंडुलम बनकर रह गई हैं।
सेविकाओं ने यह भी बताया कि आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए मिलने वाला कमरा किराया पिछले तीन वर्षों से नहीं मिला है। सरकार द्वारा प्रति माह 6000 रुपये किराया देने का निर्णय लिया गया था, लेकिन अब भी पुराने दर पर मात्र 750 रुपये का भुगतान किया जा रहा है। इस मामले पर केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी का कहना है कि केंद्रांश का भुगतान कई तकनीकी पहलुओं पर निर्भर करता है। यदि राज्य सरकार समय पर फंड खर्च का पूरा विवरण उपलब्ध नहीं कराती है तो भुगतान में दिक्कत आती है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने स्वयं चुनाव आयोग को पत्र लिखकर आंगनबाड़ी सेविकाओं को बीएलओ के कार्य से मुक्त करने का अनुरोध किया है और उम्मीद है कि जल्द ही इस दिशा में निर्णय लिया जाएगा।

गौरतलब है कि आंगनबाड़ी केंद्रों में तीन से छह वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा और पोषण की जिम्मेदारी सेविकाओं पर होती है। हर महीने केंद्रों पर टीकाकरण कार्यक्रम आयोजित किया जाता है, जिसमें गर्भवती महिलाएं, नवजात शिशु और डेढ़ वर्ष से पांच वर्ष तक के बच्चे शामिल होते हैं। इसके अलावा बच्चों को प्रतिदिन पोषाहार देना, गर्भवती और धात्री महिलाओं को सूखा राशन वितरित करना, केंद्र और राज्य सरकार की महिलाओं व बच्चों से जुड़ी योजनाओं जैसे मंईया योजना और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को लागू करना भी सेविकाओं की जिम्मेदारी है।

इसके साथ ही सेविकाएं बीएलओ का कार्य भी करती हैं। पूरे राज्य में कुल 38,432 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं और इतने ही सेविका व सहायिकाएं कार्यरत हैं। रांची शहरी क्षेत्र में लगभग 350 सेविका और सहायिकाएं हैं, जिन्हें भी मानदेय नहीं मिल पाया है। सेविकाओं को मिलने वाला इंसेंटिव भी पिछले एक साल से नहीं दिया गया है। बेहतर पोषण ट्रैकर संचालन के लिए सेविका को 500 रुपये और सहायिका को 250 रुपये दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन यह राशि भी लंबित है। सभी सेविकाओं को स्मार्टफोन तो दिया गया है, लेकिन पिछले आठ महीनों से मोबाइल रिचार्ज के लिए पैसे नहीं मिले हैं। ऐसे में सेविकाएं अपने निजी खर्च पर मोबाइल रिचार्ज कर सरकारी काम करने को मजबूर हैं। ग्रेच्युटी का लाभ भी अब तक नहीं दिया गया है, जबकि वर्ष 2022 में केंद्र सरकार ने इसकी घोषणा की थी। मानदेय में वृद्धि का वादा भी पूरा नहीं हुआ है। वर्ष 2018 के बाद से आंगनबाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं के मानदेय में एक रुपये की भी बढ़ोतरी नहीं की गई है। कुल मिलाकर आंगनबाड़ी सेविकाएं कम वेतन, बकाया भुगतान, अतिरिक्त कार्यभार और प्रशासनिक दबाव के बीच अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने को विवश हैं, जिससे आंगनबाड़ी व्यवस्था और बच्चों के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।