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पांचों नदी के समान सभी नए 5 अध्‍यक्ष अलग-अलग बहने लगे तो पानी-पानी हो जाएगी पंजाब कांग्रेस

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हेमंत कुमार

पंजाब। बोले तो पंज-आब। पांच नदियों वाला एरिया। बंटवारे के बाद रह गई हैं तीन नदियां। सतलुज, ब्यास और रावी। झेलम और चिनाब पाकिस्तान वाले पंजाब में हैं। अब यहां कांग्रेस आलाकमान ने अपना दिमाग लगाया है। कुछ ऐसा कि पंजाब में पांच दरिया तो ला नहीं सकते लेकिन पार्टी पांच अध्यक्ष तो बना ही सकती है। पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धूृ मेन अध्यक्ष और चार कार्यकारी अध्यक्ष बना डाले (संगत सिंह गिलजियां, सुखविंदर सिंह डैनी, पवन गोयल, कुलजीत सिंह नागरा)। ये सभी विभिन्न क्षेत्रों एवं जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पंजाब के नाम के हिसाब से पंज मतलब पांच की संख्या को किसी तरह बनाए रखना कांग्रेस की ऐतिहासिक देन में शुमार हो गया है। यह अलग बात है कि पांचों यदि अलग-अलग बहने लगे तो पंजाब कांग्रेस पानी-पानी हो जाएगी। 

क्रिकेट का खेल नहीं है सियासत
क्रिकेट का खेल नहीं है। लेकिन विधानसभा चुनावों के आठ महीने रहते कांग्रेस ने सियासी अट्ठा (आठ रन) मारा है। बचपन में क्रिकेट खेलते वक्त हम अपने सामथ्र्य के हिसाब से चार रन की बाउंडरी तय कर लेते थे। दिक्कत आती थी बड़े बच्चों को। उनका शॉट तय बाउंडरी से दो गुणा दूर चला जाता था। मांग होती थी कि उनके लिए चौके की जगह अट्ठे (आठ रन) का प्रावधान होना चाहिए। हमने क्रिकेट की नियमावली बचपन में भी नहीं तोड़ी। अट्ठा नहीं रखने दिया। लेकिन कांग्रेस ने पूर्व बल्लेबाज की लीडरशिप में चार कार्यकारी अध्यक्ष बना कर वो वाला अट्ठा मार दिया है। लब्बोलुआब यह कि कुछ लाफ्टर चैलेंज जैसा माहौल है।

अमरिंदर सिंह किसी की सुनते नहीं!
कैप्टन अमरिंदर सिंह संगठन को अपने हिसाब से चलाते हैं, उनसे मिलना मुश्किल है या किसी की सुनते नहीं आदि बातें हो सकती हैं। लेकिन चार साल के कांग्रेसी सिद्धू के चक्कर में अपने बुजुर्ग नेता का तमाशा बनाना कुछ खटकता है। वो भी चुनावी साल में। पार्टी को कैप्टन से आगे का जरूर सोचना चाहिए। लेकिन जो तरीका निकाला है उसमें फिलहाल तो राहत कम, परेशानी ज्यादा दिखती है। सबसे बड़ा सवाल यह कि कुछ महीनों बाद टिकट बांटने में किसकी चलेगी?  कैप्टन का पंजाब कांग्रेस में करीब दो दशक से दबदबा रहा है। यहां तक कि कांग्रेस आलाकमान भी उनके आगे हमेशा घुटने टेकती रही है। अब यदि उनके हिसाब से टिकट नहीं बंटे तो क्या वे शांत बैठेंगे?

कैरो के बाद कांग्रेस में हमेशा ही लीडरशिप का सवाल रहा

मैनें पंजाब विधानसभा के चुनाव को दो बार (2006-7 और 2011-12) हेड किया है एक अखबार के लिए। पंजाब की सियासत को बेहद बारीकी से जानने का मौका मिला। प्रताप सिंह कैरो के बाद कांग्रेस में हमेशा ही लीडरशिप का सवाल रहा है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ही कैरो के बाद लंबे समय तक सीएम बनने वाले लीडर रहे हैं। 2006 के चुनाव में मैनें कैप्टन का आधे पेज का इंटरव्यू भी किया था। सरकार उसके बाद लगातार दो बार अकाली-भाजपा की ही बनी लेकिन कैप्टन प्रासंगिक रहे। 2017 में हवा के विपरीत न केवल पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनाई बल्कि 2019 की प्रचंड मोदी लहर में कांग्रेस ने 13 में से 8 लोकसभा सीटें भी जीतीं। 

गांधी परिवार की पसंद हैं सिद्धू
सिद्धू गांधी परिवार की पसंद है, ये साफ हो चुका है। वे भाजपा में रहते हुए कांग्रेसी नेताओं के लिए क्या कहते थे और फिर कांग्रेस में आ कर कैसे यू टर्न मारा, यह देश ने देखा। चलो इस बात को भी छोड़ देते हैं। राजनीति में सब चलता है। लेकिन जो खेल यहां खेला जा रहा है शायद उसकी जरूरत नहीं थी। बेशक इस समय कई कारणों से अकालियों के पक्ष वाला माहौल नहीं है। भाजपा तो और भी बुरी स्थिति में है। अब कांग्रेस ने फेवरेबल स्थिति को ऐसे खेल में क्यों उलझाया, यह समझ से बाहर है। खैर फिलहाल तो चौके, छक्के और अट्ठे का आनंद लेते हैं। इसी बात पे ठोको ताली।

(लेखक ने जनसत्ता अखबार से करियर शुरू किया। करीब 12 साल दैनिक भास्कर में हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, पंजाब और जम्मू कश्मीर में काम किया। कवरेज के लिए देश के अन्य राज्यों में भी कई बार जाने का मौका मिला। आतंकवाद पर अंतरराष्ट्रीय वर्कशॉप (काठमांडू) अटेंड की। राजनीति, आतंकवाद और तिब्बत मसले पर ज्यादा काम। संप्रति धर्मशाला में हिमाचल दस्तक के सम्पादक।)

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।