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प बंगाल चुनाव : घरेलूु सहायिका से लेकर आदिवासी महिला तक, आधी जमीन के वे 5 चेहरे जिन्होंने बदल दिया जीत का ककहरा

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द फॉलोअप डेस्क 
प बंगाल चुनाव ने इस बार कई कीर्तिमान स्थापित किये। इनमें से एक यह भी है कि इस चुनाव में घरेलू सहायिका से लेकर आदिवासी महिला उम्मीदवार तक ने शानदार जीत दर्ज की। हमारे आकलन के अनुसार ऐसे पांच महिला चेहरे हैं, जिन्होंने इस चुनाव में जीत का सारा समीकरण, सारा ककहरा बदल दिया। इसमें RG Kar रेप पीड़िता की मां है तो दूसरी तरफ कलिता माझी हैं, जो घरेलू सहायिका हैं। एक और जमीनी संघर्ष से उठी आदिवासी महिला मैना मुर्मू हैं तो दूसरी ओर एससी सीट पर जीतने वाली इला रानी रॉय हैं, जिन्होंने साईकिल पर प्रचार किया और विधानसभा पहुंचीं। वहीं, जीत का पताका फहराने वाली रेखा महापात्रा भी हैं जो संदेशखाली गैंगरेप की पीड़िता हैं और बीजेपी ने उनको हिंगलगंज से चुनावी मैदान में उतारा था। इन सबका जिक्र यहां इसलिए जरूरी कि जब भी महिला सम्मान और महिला शक्ति की बात हो, तो इनका नाम रेखांकित किया जा सके। 

रत्ना देबनाथ (पानीहाटी सीट) 

RG Kar रेप पीड़िता की मां और BJP उम्मीदवार रत्ना देबनाथ ने उत्तरी 24 परगना की पानीहाटी विधानसभा सीट से जीत दर्ज की है। यहां देबनाथ का मुकाबला TMC उम्मीदवार तीर्थंकर घोष से था, जो 5 बार के मौजूदा विधायक के बेटे हैं। बहरहाल, जीत दर्ज करने के पहले ही देबनाथ ने कहा था, "मैंने यह चुनाव अपनी बेटी के लिए और उन महिलाओं के लिए लड़ने का फैसला किया है जिनकी सुरक्षा TMC सरकार के राज में खतरे में है।" अब वो खुले तौर पर बोल रही हैं, ममता बनर्जी और उनकी भ्रष्ट पार्टी के नेता मेरी बेटी की मौत के लिए ज़िम्मेदार हैं। जब मैं वोट मांगने गी तो लोगों ने मेरा स्वागत किया और मुझे अपने समर्थन का भरोसा दिलाया।  देबनाथ ने कहा, मैंने अपनी बेटी को खो दिया, लेकिन मैं लोगों की सेवा करना चाहती हूं और उनकी मदद करना चाहती हूं। हो सकता है कि मैं उसकी तरह डॉक्टर न बन पाऊं, लेकिन एक प्रतिनिधि के तौर पर मैं उसके मिशन को आगे बढ़ाना चाहती हूं।" इस पृष्ठभूमि के कारण,  पानीहाटी एक ऐसी महत्वपूर्ण सीट बन गई थी जहां शासन, जवाबदेही और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंताएं, पुरानी राजनीतिक निष्ठा के साथ टकरा रहीं थीं।


कलिता माझी (औसग्राम सीट)

दूसरी विजेता विधायक कलिता माझी का है, जो 37 साल की हैं और पहले घरेलू कामगार हैं। उन्होंने स्कूल का रास्ता नहीं देखा और मुश्किल से ही हस्ताक्षर कर पाती हैं। वे अब राजनेता बन गई हैं। उन्होंने पश्चिम बंगाल में भाजपा के टिकट पर औसग्राम विधानसभा सीट जीतकर एक असाधारण चुनावी सफ़र लिखा है। उन्हें 1,07,692 वोट मिले, और उन्होंने अपनी सबसे करीबी प्रतिद्वंद्वी, तृणमूल कांग्रेस की श्यामा प्रसन्ना लोहार को 12,535 वोटों के अंतर से हराया। माझी ने पात्रा पारा में दो दशकों से ज़्यादा समय तक घरेलू कामगार के तौर पर काम किया है। अपने इलाके में वे कई परिवारों के साथ अपने जुड़ाव के लिए जानी जाती हैं। ऐसे ही एक परिवारों में उन्हें "बेटी जैसा" माना जाता है। उनकी जीत के पीछे इसे एक बड़ा कारण बताया जा रहा है। उन्हें जानने वाले बताते हैं कि उनके मालिक उन्हें अनुशासित और भरोसेमंद मानते हैं। चुनाव के दौरान वे अक्सर सुबह-सुबह ही काम पर लग जाती थीं। अपनी ज़िम्मेदारियों के बावजूद, वे अपने गांव के ज़मीनी जीवन से गहराई से जुड़ी रहीं। अंतत: उनकी ये निष्ठा और ईमानदारी काम आई। 

मैना मुर्मू (मानबाजार सीट)
बतौर भाजपा उम्मीदवार मैना मुर्मू ने मानबाजार (विधानसभा क्षेत्र 243) में शानदार जीत हासिल की है। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार संध्या रानी टुडू को 27,283 वोटों के अंतर से हराया है। बता दें कि मानबाजार (ST), विधानसभा क्षेत्र संख्या 243, दक्षिण बंगाल के पुरुलिया जिले में स्थित है, जो मानबाजार उप-मंडल के अंतर्गत झारखंड सीमा के निकट है। इस विधानसभा क्षेत्र में मानबाजार I और II सामुदायिक विकास खंड शामिल हैं। इस क्षेत्र की विशेषता हैं, लेटराइट की पहाड़ियां, छोटी नदियां और कृषि योग्य मैदान, जिनके बीच-बीच में वन क्षेत्र भी हैं। इस बैकग्राउंड से समझा जा सकता है कि आदिवासी परिवार से आनेवाली मैना मुर्मू का संघर्ष हमेशा से बुनियादी सुविधाओं के लिए रहा है। उन्होंने पूरा जीवन अभावों के बीच बिताया है। कभी जंगलों से लकड़ी चुनकर चूल्हा जलाना, तो कभी बारिश के भरोसे होने वाली खेती पर गुजारा करना, यही उनकी सच्चाई रही है।  मानबाजार जैसे इलाकों में पीने का पानी आज भी एक बड़ी समस्या है। मैना ने सालों तक इन मुद्दों पर छोटे-छोटे आंदोलन किये। 2026 के चुनाव आए, तो उन्होंने सत्ताधारी दल की एक बेहद ताकतवर और कद्दावर नेता को चुनौती दी। लोगों को लगा था कि मैना हार जाएंगी, लेकिन नतीजों ने सबको चकित कर दिया। 

इला रानी रॉय, कांग्रेस (मेखलीगंज)
बंगाल मेखलीगंज (SC) सीट से जीत दर्ज करने वाली इला रानी रॉय ने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की है। ये सीट राज्य के उत्तरी हिस्सा में अपनी भौगोलिक विषमताओं के लिए जानी जाती है। इला के पास चुनाव प्रचार के लिए न तो बड़ी गाड़ियां थीं और न ही वोटरों तक पहुंच बनाने के लिए कोई बहुत बड़ी टीम। देखने वालों देखा कि इला रानी ने पूरा चुनाव साइकिल पर और पैदल चलकर लड़ा। अपने इलाके में उन्होंने कई साल ज़मीनी स्तर पर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम किया है। लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लोगों ने खुद उनके लिए चंदा इकट्ठा किया और उनके चुनाव को अपना चुनाव बना लिया। वे जब भाषण देने खड़ी होती थीं, तो लोग भावुक हो जाते थे क्योंकि इला ने हमेशा उनके दुख-सुख में उनका साथ दिया। इला रानी की जीत ये भी साबित करती है कि बंगाल में अभी भी पुरानी परिपाटी की चुनावी शैली जीवित है, जहां नेता और जनता के बीच किसी बिचौलिये की भूमिका नहीं होती। अब वे विधानसभा में अभावों और संघर्ष की आवाज बनेंगी। 


रेखा महापात्रा (हिंगलगंज सीट)
बंगाल चुनाव में नतीजों के बाद संदेशखाली का जिक्र अलग से करना जरूरी है। क्योंकि संदेशखाली गैंगरेप की पीड़िता रेखा महापात्रा ने हिंगलगंज से जीत का परचम लहराया है। रेखा ने तृणमूल उम्मीदवार आनंद सरकार को 5421 वोटों से हरा दिया। गौरतलब है कि भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में भी रेखा पात्रा को बशीरहाट लोकसभा सीट से टिकट दिया था, तब वे  हार गई थीं। लेकिन इस बार, विधानसभा चुनाव में रेखा ने विधानसभा तक पहुंचने में सफलता पाई। इसका मतलब है साल 2024 में संदेशखली की गलियों से उठी जो आवाज़ पूरे देश में गूंजी थी, उसे इस इलाके वोटरों ने याद रखा। जानकारों की मानें तो रेप पीड़िता रेखा पात्रा का चुनावी मैदान में उतरना सिर्फ एक सियासी लड़ाई नहीं थी, बल्कि ये संदेशखली के आत्मसम्मान की लडाई थी। याद रखना चाहिये कि रेखा महापात्रा वही महिला हैं जिन्होंने सत्ता के रसूखदारों के खिलाफ सबसे पहले अपना मुंह खोला और महिलाओं के साथ हुए शोषण के विरुद्ध मोर्चा खोलकर लड़ने के लिए आगे आईं। उनके पास न तो राजनीति के दावपेंच थे, न संसाधन और न अनुभव। उनके पास था तो उन सैकड़ों महिलाओं का भरोसा जो सालों से डर के साये में जीने को विवश थीं। रेखा उन सबकी आवाज बनकर उभरी हैं। 


 

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