द फॉलोअप, रांची
झारखंड में कोई भी नियुक्ति प्रक्रिया यदि सही तरीके से पूरी हो जाए, तो वह दिन इतिहास में दर्ज होगा। कारण यह है कि यहां बहाली के लिए विज्ञापन निकलने से लेकर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने तक किसी न किसी प्रकार की दिक्कत सामने आ ही जाती है। 21 अप्रैल 2026 को सीएम हेमंत सोरेन ने आंगनबाड़ी महिला पर्यवेक्षिकाओं को नियुक्ति पत्र बांटे। हालांकि कुल 313 पदों पर नियुक्ति के लिए JSSC ने विभाग को अनुसंसा भेजी थी। लेकिन मुख्यमंत्री ने उस दिन केवल 234 महिला पर्यवेक्षिकाओं को ही नियुक्ति पत्र सौंपा गया।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि शेष 79 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र क्यों नहीं दिया गया। इतना ही नहीं 21 अप्रैल से पूर्व विभाग ने सभी 313 सफल अभ्यर्थियों के प्रमाण पत्रों का सत्पापन कर, सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट क्यों नहीं किया कि कुछ अभ्यर्थियों के प्रमाण पत्रों में त्रुटियां हैं। साथ ही त्रुटि क्या है।

डॉक्युमेंट वेरिफिकेशन से जुड़ा है पूरा मामला
इस पूरे मामले की जड़ डॉक्युमेंट वेरिफिकेशन से जुड़ी हुई है। पहले JSSC ने अभ्यर्थियों का दस्तावेज़ सत्यापन किया और उसके आधार पर 313 सफल अभ्यर्थियों की नियुक्ति की अनुशंसा कर दी। लेकिन इसके बाद महिला एवं बाल विकास विभाग ने दोबारा दस्तावेज़ों का सत्यापन शुरू कर दिया। अब विभाग अभ्यर्थियों से वर्ष 2023 के प्रमाण पत्र मांग रहा है, यानी उसी समय के दस्तावेज़ जब विज्ञापन जारी किया गया था। अभ्यर्थियों का कहना है कि इस तरह की कोई भी शर्त विज्ञापन में लिखी हुई नहीं थी। उनका सवाल है कि जब JSSC ने पूरी प्रक्रिया पूरी कर ली और अनुशंसा भी कर दी, तो विभाग दोबारा वही प्रक्रिया क्यों दोहरा रहा है।

79 अभ्यर्थी असमंजस और परेशानी में हैं
इसके साथ ही विभाग पर यह आरोप भी लग रहा है कि यदि किसी प्रकार की त्रुटि है या अतिरिक्त दस्तावेज़ की आवश्यकता है, तो उसे लिखित रूप में बताया जाए, लेकिन विभाग इस संबंध में कुछ भी लिखित देने को तैयार नहीं है। उल्लेखनीय है कि जब JSSC दस्तावेज़ सत्यापन कर रहा था, तब महिला एवं बाल विकास विभाग के कर्मचारी भी उस प्रक्रिया में शामिल थे और उन्होंने इसे सही बताया था, लेकिन अब वही कर्मचारी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। इस कारण 79 अभ्यर्थी असमंजस और परेशानी में हैं।
अभ्यर्थी रूबी कुमारी के पति ने बताया कि वे विभाग के चक्कर लगाकर थक चुके हैं, लेकिन कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल रहा है। मजबूर होकर उन्हें विभाग के सचिव से लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक को पत्र लिखना पड़ रहा है।
