द फॉलोअप डेस्क
राजनीति में जन समस्याओं, ज्वलंत समस्याओं और आम समस्याओं को आम सहमति से हल करने की बात केवल कहने की होती है। इसका नजारा सोमवार को झारखंड विधानसभा में भी देखने को मिला। 50 विधायकों की मांग नहीं, आग्रह को उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने तकनीकी और कानूनी पहलुओं का हवाला देकर सलीके से अंगूठा दिखा दिया। प्रदीप यादव कहते रहे कि वे सदन में सरकार के उत्तर के लिए नहीं आए हैं। सरकार उन्हें अपने उत्तर से निरुत्तर कर सकती है। लेकिन वह चाहते हैं कि 15 वर्षों से सेवा दे रहे लेक्चररों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो, इसका सदन में समाधान हो। उन्होंने यह भी कहा कि उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के वैसे पदाधिकारी जो आज एआईसीटीई के नॉर्म्स का हवाला देकर मांग को ठुकराने की तरकीब बता रहे हैं, वही कल छात्रों के मजबूरन कोर्ट जाने पर वहां भींगी बिल्ली की तरह दिखायी पड़ेंगे। लेकिन सुदिव्य कुमार सोनू 50 विधायकों की मांगों के आगे झुकने को कत्तई तैयार नहीं हुए। उन्होंने यहां तक कहा-विभाग ने तकनीकी तौर पर कहीं कोई गलती नहीं की है। अगर किसी को लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है तो वे बेहिचक कोर्ट जा सकते हैं। सरकार न्यायादेश का पालन करेगी। लेकिन गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा और आने वाले भविष्य को ध्यान में रख कर शर्तों में बदलाव नहीं कर सकेगी। मामला पॉलिटेक्निक कॉलेजों में नीड बेस्ड लेक्चररों की नियमित नियुक्ति में समायोजित करने से संबंधित था।

प्रदीप यादव का कहना था कि पूर्व में सरकार ने इन लेक्चररों के भविष्य को लेकर सहानुभूति पूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया था। लेकिन आश्वासन देने से पूर्व ही विभाग ने जेपीएससी को नियुक्ति के लिए अधियाचना भेज दी। अधियाचना में 15 वर्षों से सेवारत नीड बेस्ड टीचरों को मात्र पांच अंकों की अधिमान्यता दी गयी है। इससे वे नियमित नियुक्ति में सफल ही नहीं हो पाएंगे। क्योंकि एम टेक, एम फिल करनेवाले छात्रों को 15 अंकों की अधिमान्यता दी गयी है। उन्होंने बताया कि हरियाणा ने कैसे अपने यहां इस तरह के शिक्षकों को समायोजित किया है। बिहार ने लिखित परीक्षा में सेवारत शिक्षकों को 25 अंकों की अधिमान्यता दी। इस पर सुदिव्य सोनू बिफर भी पड़े। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर बिहार के ही नॉर्म्स को मानना था तो झारखंड बिहार से अलग ही क्यों हुआ। शालीनता में ही सही सोनू ने 50 विधायकों की मांगों यह कह कर पलीता लगा दिया कि आज वह मंत्री हैं, लेकिन विधायक बहुत कमजोर प्राणी होता है। जब उसके पास क्षेत्र का कोई व्यक्ति अपनी समस्या को लेकर आता है तो उसे दूर करने के लिए झुकना ही पड़ता है। उनके कहने का तात्पर्य साफ था कि आप शिक्षकों की मांगों के आगे झुक रहे हैं, लेकिन तकनीकी और कानूनी दृष्टि से उसे पूरा करना संभव नहीं है।
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हालांकि प्रदीप यादव बार बार गिरगिराते गए कि 2015 की नियुक्ति नियमावली भले कुछ कहती है, लेकिन उसे संशोधित करने का अधिकार तो सरकार के पास है। उनकी ही नहीं, अन्य 50 विधायकों की मंशा तो सिर्फ इतनी भर है कि 15 वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों, जिन्होंने अपना उम्र खो दिया है, अब भविष्य भी कहीं अंधेरे में जाकर खो जाए। झामुमो के वरिष्ठ विधायक मथुरा महतो के भी इस आग्रह पर कि वर्षों से सेवा दे रहे इन लोगों के भविष्य की चिंता कीजिए, मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू पर इसका भी कोई असर नहीं हुआ।
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