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चांडिल के कंगलाटांड़ में है रूपी सोरेन का मायका, सोहराय-बांदना पर्व मनाने आती थीं; गांव में शोक

चांडिल के कंगलाटांड़ में है रूपी सोरेन का मायका, सोहराय-बांदना पर्व मनाने आती थीं; गांव में शोक

द फॉलोअप डेस्क, रांची:

सरायकेला-खरसावां जिला स्थित चांडिल प्रखंड अंतर्गत कंगलाटांड़ (धातकीडीह) में रूपी सोरेन का मायका था। बुधवार को उनके निधन की सूचना पर चांडिल में भी शोक की लहर दौड़ गई। रिश्तेदारों और परिजनों का कहना है कि रूपी सोरेन का चांडिल स्थित मायके से गहरा लगाव था। वह, अक्सर समय मिलने पर चांडिल आतीं और मायके में खूब सारा वक्त बिताती थीं।  वह गांव में अपनी बचपन की सहेलियों और बच्चों के साथ भी बहुत आत्मीयता से मिलती थीं। रूपी सोरेन आखिरी बार 13 मार्च 2026 को भाई गुरुचरण किस्कू के बेटे की शादी में  शरीक होने चांडिल आई थीं। उनके साथ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, बहू कल्पना मुर्मू सोरेन, पोते और परिवार के बाकी सदस्य भी पहुंचे थे। 

सोहराय और बांदना पर्व में मायके आती थीं
परिजनों ने रूपी सोरेन को याद करते हुए बताया कि वह अक्सर सोहराय और बांदना पर्व पर मायके कंगलाटांड़ आती थीं। वह पूरे परिवार के साथ गांव पहुंचती और मायके में कई दिन बिताया करती थीं। रूपी सोरेन को अपने भाई-बहनों के साथ वक्त बिताना और पुरानी दिनों को याद करना बहुत पसंद था। मिलनसार और हंसमुख स्वाभाव की रूपी सोरेन ग्रामीणों से काफी सहजता से मिलती थी। 

कंगलाटांड़ गांव में अभी उनके भाई गुरुचरण किस्कू और चारू चांद किस्कू समेत अन्य रिश्तेदार रहते हैं।

 

बुधवार देर शाम रूपी सोरेन ने ली अंतिम सांस
गौरतलब है कि लंबे समय से बीमार चल रहीं रूपी सोरेन ने बुधवार देर शाम को रांची के हिल व्यू अस्पताल में अंतिम सांस ली। इससे पहले तबीयत बिगड़ने पर उन्हें हैदराबाद ले जाया गया था। हिल व्यू अस्पताल में उनकी बिगड़ती सेहत के बीच डॉक्टरों ने पेसमेकर लगाने का फैसला किया था। उन्हें अस्थायी पेसमेकर लगाया भी गया, लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। 

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