रांची
स्टेन स्वामी की पुण्यतिथि के मौके पर आज झारखंड के 100 से अधिक सचेत नागरिकों, जन संगठनों और राजनीतिक प्रतिनिधियों ने एक साझा बयान जारी किया है। यह बयान छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में माओवादी आंदोलन के ख़ात्मे की आड़ में हो रहे कथित राज्य दमन के विरुद्ध है। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि इस दमन का असली मकसद आदिवासी ज़मीनों को कॉर्पोरेट लूट के लिए खाली कराना है। साथ ही उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की ओर से घोषित युद्धविराम और शांतिवार्ता के प्रस्ताव पर सरकार से सकारात्मक प्रतिक्रिया की मांग की है।

“ऑपरेशन कगार” के नाम पर सैकड़ों हत्याओं का आरोप
जनवरी 2024 में बस्तर में शुरू हुए केंद्र सरकार के “ऑपरेशन कगार” में अब तक करीब 500 लोगों की हत्या का दावा किया गया है, जिनमें कई आम नागरिक भी शामिल हैं। वक्तव्य में कहा गया है कि इन कार्रवाइयों में सुरक्षा बलों को इनाम और प्रशस्ति दी गई, जबकि दूसरी ओर, शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध—जैसे विस्थापन, जबरन खनन या कैंप निर्माण के खिलाफ जन आंदोलनों—को भी दबाया गया। बस्तर के ‘मूलवासी बचाओ मंच’ को प्रतिबंधित कर इसके नेताओं को यूएपीए समेत गंभीर धाराओं में गिरफ़्तार किया गया है।
आदिवासी ज़मीनों पर बलपूर्वक कैंप, महिलाओं में असुरक्षा
बयान में कहा गया है कि बस्तर में 160 और झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम में 25 से अधिक सुरक्षा बलों के कैंप आदिवासियों की सार्वजनिक और रैयती ज़मीन पर बिना ग्राम सभा की अनुमति के स्थापित किए गए हैं। रात के अंधेरे में चुपचाप लगाए गए इन कैंपों से स्थानीय सामाजिक ढांचा प्रभावित हुआ है, महिलाओं में भय और असुरक्षा बढ़ी है, और पूरे इलाके में दमन का वातावरण बना है।

शांतिवार्ता की अनदेखी, “खत्म करने” की नीति
हाल के महीनों में भाकपा (माओवादी) ने कई बार युद्धविराम की घोषणा की और शांतिवार्ता की इच्छा जताई, परंतु सरकार ने इसका उत्तर हिंसा से दिया है। जून 2025 में कर्रेगुट्टा पहाड़ी क्षेत्र में एक सैन्य अभियान में 31 लोगों को मार गिराया गया, जिनमें कई निहत्थे आदिवासी थे। परिजनों से शवों को कई दिन छिपाकर रखा गया, जिससे वे सड़ गए। मई में माओवादी महासचिव बसवराजु की कथित मुठभेड़ में हत्या के बाद शव उनके परिवार को नहीं सौंपे गए और बिना अनुमति के जला दिए गए।
बयान में कहा गया है कि यह सब संविधान, मानवाधिकार और आदिवासी रीति-रिवाजों का गम्भीर उल्लंघन है। माओवादी नेताओं को हिरासत में लेने के बावजूद उनकी गिरफ़्तारी की पुष्टि तक नहीं की गई है, जिससे “गुप्त हत्या” की आशंका और गहरी होती है।

मांगें और अपील
साझा वक्तव्य में केंद्र और राज्यों की सरकारों से निम्न मांगें रखी गई हैं —
1. माओवादी विरोधी सैन्य अभियानों को अविलंब रोका जाए और एक निष्पक्ष युद्धविराम लागू किया जाए।
2. आदिवासी समुदायों से उनके मुद्दों पर तत्काल संवाद शुरू हो।
3. भाकपा (माओवादी) के साथ शांति वार्ता की प्रक्रिया शुरू की जाए।
4. ‘मूलवासी बचाओ मंच’ से प्रतिबंध हटाया जाए और उसके नेताओं को रिहा किया जाए।
5. ग्राम सभा की सहमति के बिना बने सभी सैन्य कैंप हटाए जाएं, खासकर वे जो स्कूलों में चल रहे हैं।
6. PESA, पांचवीं अनुसूची, वन अधिकार कानून समेत सभी प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधानों को पूरी तरह लागू किया जाए।
माओवादियों से भी समीक्षा की अपील
झारखंड के संगठनों और नागरिकों ने भाकपा (माओवादी) से भी अपील की कि वह अपने संघर्ष के पचास वर्षों के अनुभव और वर्तमान हालात को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीतियों और कार्यनीति की पुनर्समीक्षा करे। उन्हें न्याय, मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता के मूलभूत सिद्धांतों के आलोक में काम करना चाहिए ताकि आम आदिवासी जन की आकांक्षाओं और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जा सके।
