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झारखंड का वो इलाका जहां फायरिंग की आवाज से खुश होते हैं लोग, गोली चलती है तो मिलती है रोटी

झारखंड का वो इलाका जहां फायरिंग की आवाज से खुश होते हैं लोग, गोली चलती है तो मिलती है रोटी

धनबाद 
लोग गोलियों की आवाज सुनकर घरों में दुबक जाते हैं। कई लोगों की जान इसके चलने से चली जाती है। लेकिन अपने झारखंड में ही एक स्थान ऐसा भी है, जहां लोग गोलियों के चलने का इंतेजार करते हैं। यहां गोली नहीं चलने से लोग उदास हो जाते हैं और उनके समक्ष जीवन मरण का प्रश्न उठ खड़ा होता है। जी हां, ये स्थान है कोयलानगरी धनबाद के पास बसा मैथन और इसके आसपास का एरिया। इस स्थान पर गोलियां नहीं चलें तो कई लोगों के घरों में चूल्हा नहीं जलेगा। उनको खाने के लिए रोटी नहीं मिलेगी। दूसरे शब्दों में कहें तो यहां बंदूक की गोलियां मौत नहीं रोटी बांटती है। झारखंड का ये खास स्थान है मैथन का थर्ड डाइक फायरिंग रेंज। जहां बंदूक की गोलियों से ही लोग दो वक्त की रोटी का इंतेजाम करते हैं। बच्चों के लिए शिक्षा का इंतेजाम करते हैं। और तन ढंकने के लिए कपड़े खरीदते हैं। 

इस तरह बंदूक की गोलियों से मिलती है रोटी  
दरअसल थर्ड डाइक फायरिंग रेंज में कई सुरक्षा एजेंसियों के जवान फायरिंग की प्रैक्टिस करते हैं। इनमें कुछ खास हैं सीआईएसएफ, धनबाद पुलिस, आरपीएफ, झारखंड पुलिस, अद्धसैनिक बल के जवान और सीआरपीएफ आदि। यहां जवानों को फायरिंग की ट्रेनिंग दी जाती है। यहां जवानों को एके-47 से लेकर इंसास, एके-56, एलएमजी, पिस्टल, माउजर और राइफल चलाने तक का प्रशिक्षण दिया जाता है। इस दौरान जवान हजारों गोलियां प्रतिदिन चलाते हैं। और इन गोलियों के खोखे यानी अगले भाग के खोल को लोग जमा करते हैं। फिर इनको बाजार में बेच देते हैं। खास धातु से बने इन खोखे को लोग बाजार में 150 रुपये से लेकर 500 रुपये किलोग्राम तक की दर से बेचते हैं। और इसी से इनका परिवार चलता है। मैथन के निकट बसे गांव बसकेटिया, धनुडीह, कालीपथर, बथानडीह के बच्चे और परिवार के बड़े सदस्य भी फायरिंग के समय गोलियों चलने का इंतेजार करत रहते हैं। और फायरिंग का समय खत्म होते ही वे फायरिंग रेंज के मैदान में जाकर इन गोलियों के खोखे को इकट्ठा करने में जुट जाते हैं। 


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