द फॉलोअप, रांची/गिरिडीह
गिरिडीह उपचुनाव को लेकर सियासी हलचल शुरू हो गयी है। एक तरफ जेएमएम अपनी सीट बचाने की जुगत में है, तो दूसरी तरफ बीजेपी के भीतर टिकट को लेकर रस्साकशी बढ़ने लगी है। भाजपा और झामुमो के बीच अब जयराम महतो की पार्टी जेएलकेएम के रुख का भी विश्लेषण शुरू है। इस उप चुनाव में जेएलकेएम के मजबूत फैक्टर बनने से कोई इंकार नहीं कर रहा है।
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बीजेपी में टिकट की दौड़ में दिखायी पड़ रहे पांच दावेदार
भाजपा के भीतर टिकट को लेकर खींचतान की आहट आने लगी है। एक सांसद की पसंद के तौर पर दिनेश प्रसाद यादव का नाम आगे चल रहा है, जो गिरिडीह के पूर्व नगर परिषद अध्यक्ष रह चुके हैं और वर्तमान में कोडरमा लोकसभा क्षेत्र के सांसद प्रतिनिधि हैं। वहीं सुरेश साव के नाम की भी चर्चा है, लेकिन संगठन महामंत्री बदलने से इनके नाम पर मुहर लगना आसान नहीं दिख रहा। दो बार चुनाव हार चुके निर्भय शाहबादी के नाम पर भी आखिरी बार पार्टी में सहमति बनाने की कोशिश हो रही है। इसके साथ अब रवीन्द्र राय का नाम भी दावेदारों की सूची में जुड़ गया है, जिस पर पार्टी के भीतर गंभीरता से विचार चल रहा है। मालूम हो कि 2024 के विधानसभा चुनाव में मनाने के लिए रवींद्र राय को गिरिडीह का ऑफर भी मिला था। यानी बीजेपी फिलहाल चार-पांच दावेदारों के बीच फंसी है और नाम तय होने में अभी वक्त लग सकता है।

जेएलकेएम फैक्टर: उम्मीदवार न देने पर किसे फायदा?
इस उपचुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू जयराम महतो की पार्टी जेएलकेएम को लेकर बना हुआ सस्पेंस है। सवाल है कि अगर जेएलकेएम गिरिडीह उपचुनाव में अपना उम्मीदवार नहीं उतारता है तो उसका वोटर आखिर किस तरफ शिफ्ट होगा। कुछ रणनीतिकारों का मानना है कि इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलेगा। यह अंदाजा बेवजह नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनाव में गिरिडीह सीट से खुद जयराम महतो चुनाव लड़े थे और भले ही जीत हासिल नहीं कर पाए, लेकिन उन्होंने 3 लाख 47 हजार 322 वोट हासिल कर अपनी सियासी ताकत का अहसास करा दिया था। कुर्मी समुदाय से आने वाले जयराम महतो का यह वोट बैंक गिरिडीह इलाके में खासा मजबूत माना जाता है। ऐसे में अगर जेएलकेएम इस उपचुनाव से दूर रहता है, तो यह बड़ा वोट बैंक "फ्री" हो जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का एक तबका मानता है कि यह वोट बंटकर या सीधे बीजेपी की तरफ मुड़कर मुकाबले को कांटे का बना सकता है। खासकर तब जब 2024 विधानसभा चुनाव में जेएमएम और बीजेपी के बीच जीत-हार का अंतर सिर्फ 3,838 वोटों का रहा हो। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि जेएलकेएम का वोटर जरूरी नहीं कि पूरी तरह बीजेपी के खाते में ही जाए। कुछ हिस्सा जेएमएम या नोटा की तरफ भी जा सकता है, इसलिए यह सिर्फ एक संभावना है। निश्चित समीकरण नहीं। कुल मिलाकर गिरिडीह उपचुनाव अब सिर्फ जेएमएम बनाम बीजेपी की सीधी लड़ाई नहीं होगी, बल्कि इसमें बीजेपी की आंतरिक गुटबाजी और जेएलकेएम की रणनीति दोनों ही नतीजे को प्रभावित करने वाले अहम फैक्टर बनेंगे। असली तस्वीर तभी साफ होगी जब उम्मीदवारों के नाम और चुनाव की तारीख दोनों घोषित हो जाएंगे। हालांकि अभी से यह मानना भूल होगी कि जेएलकेएम उम्मीदवार नहीं देगा। इस संभावना से कत्तई इंकार नहीं किया जा सकता कि वह जीत हार की जगह अपने वोट बैंक को केंद्र में रख कर उम्मीदवार देगा। क्योंकि उसका बड़ा राजनीतिक लक्ष्य अगला आम चुनाव है। इसलिए भाजपा, झामुमो या अपने मतदाताओं को उलझाए रखना अभी उसकी रणनीति हो सकती है।
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