द फॉलोअप डेस्क
धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की आज पुण्यतिथि है। इनकी मृत्यु 9 जून 1900 में हुई थी। बता दें कि बिसरा मुंडा आदिवासियों के सबसे बड़े नेता थे और उन्हें भगवान की उपाधि प्राप्त है। उन्होंने जंगल,जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ी थी। अंग्रेजों, जमींदारों और शोषकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। बिरसा मुंडा कितने बड़े जननायक थे, इसका अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि इनके नाम पर राज्य में कई योजनाएं चलती हैं, संसद भवन में भी इनकी प्रतिमा स्थापित है। राज्यवासी हर मौके पर धरती आबा बिरसा मुंडा को बड़ी शिद्दत के साथ याद करते हैं और राज्य में हर जगह इनका नाम बड़े अदब से लिया जाता है। आज राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन और मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किया।

राज्यपाल और सीएम ने श्रद्धा सुमन अर्पित की
मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने अपने सोशल मीडिया एक्स पर ट्वीट कर लिखा है कि जोहार धरती आबा !हमारी सरकार आपके आदर्शों और "अबुआ दिशोम, अबुआ राज" की परिकल्पना को साकार करने के लिए प्रयासरत है।आज राज्यपाल सी० पी० राधाकृष्णन जी के साथ भगवान बिरसा मुंडा जी को श्रद्धा सुमन अर्पित किया। भगवान बिरसा मुंडा स्मृति उद्यान एवं संग्रहालय
नेतृत्वकर्ता थे बिरसा
बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को उस वक्त के रांची और वर्तमान के खूंटी जिले के उलिहातू गांव में एक आदिवासी परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी मुंडा था। इनकी शुरुआती पढ़ाई लिखाई गांव में हुई, इसके बाद वे चाईबासा चले गए, जहां इन्होंने मिशनरी स्कूल में पढ़ाई की। इस दौरान वे अंग्रेज शासकों की तरफ से अपने समाज पर किए जा रहे जुल्म को लेकर चिंतत थे। आखिरकार उन्होंने अपने समाज की भलाई के लिए लोगों को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाने की ठानी और उनके नेतृत्वकर्ता बन गए। उस दौरान 1894 में छोटानागपुर में भयंकर अकाल और महामारी ने पांव पसारा। उस समय नौजवान बिरसा मुंडा ने पूरे मनोयोग से लोगों की सेवा की।

1894 में फूंका अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन का बिगुल
1894 में इन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लगान माफी के लिए आंदोलन की शुरुआत कर दी। 1895 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हजारीबाग जेल में दो साल बंद रहे। इस दौरान 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके 400 सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेजी सेनाओं से हुई, जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गई लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद जनवरी 1900 डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ था, जिसमें बहुत से औरतें और बच्चे मारे गये थे। उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को संबोधित कर रहे थे, बाद में बिरसा के कुछ शिष्यों की गिरफ्तारियां भी हुईं।