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भाजपा ने पूरी की जिला कमेटियों में पदाधिकारियों के चयन को लेकर रायशुमारी की खानापूर्ति

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द फॉलोअप डेस्क
झारखंड भाजपा ने रायशुमारी की एक और खानापूर्ति की है। रायशुमारी के लिए प्रत्येक जिले में पार्टी के एक सीनियर व्यक्ति को भेजा गया। उदाहरण के रूप में रांची में अभय सिंह को भेजा गया था। रायशुमारी के माध्यम से यह जानने की कोशिश की गयी कि जिला कमेटियों में संगठन हित में किस नेता को पदाधिकारी बनाना उपयुक्त होगा। प्रदेश कमेटी की योजना है कि एक सप्ताह में जिला कमेटियों का गठन कर लिया जाए। रायशुमारी के लिए कुछ शर्तें रखी गयी। इसमें उन नेताओं की राय ली गयी जो उस जिले से सांसद, विधायक, प्रदेश पदाधिकारी, पूर्व जिलाध्यक्ष और मोर्चा के प्रदेश पदाधिकारी हैं। जानकारी के अनुसार पहले चरण में अधिकतर जिलों के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने नाम सुझाने से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि संगठन खुद तय करे कि किसे पदाधिकारी बनाना बेहतर होगा। लेकिन प्रदेश भाजपा का दबाव पड़ने पर कुछ निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने मौखिक रूप से तो कुछ लिखित रूप से नाम सुझाए। फिर भी अधिकतर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने इस लफड़े से अपने को दूर ही रखा।


250-300 नामों में कैसे चयन होगा 13-15 पदाधिकारी के नाम
रायशुमारी के लिए शर्त थी कि जिला कमेटी के एक पदाधिकारी के लिए दो नामों का सुझाव देना था। जिला कमेटियों में पदाधिकारी के 13-15 पद हैं। इन पदों के लिए प्रत्येक जिले से लगभग 250 से 300 नाम आए हैं। अब सवाल खड़ा किया जा रहा है कि इन नामों में से 13-15 पदाधिकारी बनाए जानेवाले नेताओं के नाम कैसे तय किए जाएंगे। फिर यह तय कौन करेगा। तय करने के लिए फार्मूला क्या होगा। क्या जिस नेता के नाम की सबसे अधिक अनुशंसा की गयी है, उसे ही उस पद पर बैठाया जाएगा। लेकिन जानकार बताते हैं कि यह सब केवल आई वाश है। जिला कमेटियों में पदाधिकारी तो वही बनेंगे जिसकी जितनी पैरवी और पहुंच होगी। यह तो केवल दिखावे के लिए केवल औपचारिकता मात्र है।


रायशुमारी में पहुंचे नेताओं ने अपनी ही पैरवी करने लगे
बताते हैं कि रांची में हुई रायशुमारी की जानकारी अधिकतर लोगों को नहीं थी। जिन लोगों को भनक मिली, वे रायशुमारी में पहुंच गए। फिर वे वहां उपस्थित बड़े नेताओं से अपने लिए ही पैरवी करने लगे। विरोध होने पर उन्हें किसी तरह अलग किया गया। दिलचस्प स्थिति यह भी बनी कि विभिन्न मोर्चों के प्रदेश पदाधिकारियों से भी रायशुमारी की गयी। लेकिन मोर्चा के पदाधिकारी खुद जिला कमेटी में पदाधिकारी बनने को उतावले दिखे। अपने लिए ही पैरवी करने लगे।

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