द फॉलोअप डेस्क
हेमंत सोरेन कैबिनेट में मंत्री और गिरिडीह सदर के विधायक सुदिव्य कुमार सोनू का निधन 6 सितंबर 2026 की सुबह हो गया। उनके निधन के साथ झारखंड की राजनीति में एक ऐसी राजनीतिक यात्रा का अंत हुआ, जिसकी शुरुआत करीब 37 वर्ष पहले झारखंड मुक्ति मोर्चा के एक प्राथमिक सदस्य के रूप में हुई थी। उनका जीवन कभी सामान्य नहीं रहा। खासकर राजनीतिक जीवन। झामुमो में शामिल होने के बाद उन्होंने संगठन में काम किया, गिरिडीह नगर इकाई की जिम्मेदारी संभाली, विधानसभा चुनाव लड़े और लगातार दो बार हार का सामना किया। इसके बाद 2019 में पहली बार विधायक बने और 2024 में लगातार दूसरी बार चुनाव जीतने के बाद झारखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। वहीं, सीएम हेमंत सोरेन के लिए ये अलग से दुखद इसलिए है कि सुदिव्य सोनू, उनके साथ चलने वाले, पांचवें ऐसे नेता थे, जिनका जनता के बीच सीधा प्रभाव और पहुंच था और जो अब हमारे बीच नहीं हैं। इस कड़ी में दिवंगत हाजी हुसैन अंसारी, जगरनाथ महतो, राजेंद्र सिंह, रामदास सोरेन को याद किया जा सकता है।

1989 में झामुमो से जुड़कर शुरू किया सार्वजनिक जीवन
सुदिव्य कुमार सोनू वर्ष 1989 में झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्राथमिक सदस्य बने। उस समय झारखंड अलग राज्य नहीं बना था और झामुमो अलग राज्य आंदोलन की प्रमुख राजनीतिक ताकतों में शामिल था। पार्टी से जुड़ने के बाद सुदिव्य कुमार सोनू ने संगठन में काम करना शुरू किया। तीन वर्ष बाद, 1992 में उन्हें गिरिडीह नगर झामुमो का संस्थापक अध्यक्ष बनाया गया। यह उनके राजनीतिक जीवन की पहली बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारियों में से एक थी। इसके बाद वे लगातार झामुमो की राजनीति में सक्रिय रहे। संगठन के स्तर पर काम करते हुए उन्होंने गिरिडीह में अपनी राजनीतिक पहचान बनाई।
2009 में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा
करीब दो दशक तक संगठन में सक्रिय रहने के बाद सुदिव्य कुमार सोनू ने चुनावी राजनीति में कदम रखा। वर्ष 2009 में उन्होंने पहली बार गिरिडीह विधानसभा सीट से झामुमो के टिकट पर चुनाव लड़ा। हालांकि, उन्हें इस चुनाव में सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद उन्होंने राजनीति से दूरी नहीं बनाई और संगठन में सक्रिय बने रहे। पांच साल बाद 2014 में वे एक बार फिर गिरिडीह विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे। इस बार भी उन्हें जीत नहीं मिली और वे दूसरे स्थान पर रहे। उस चुनाव में भाजपा के निर्भय कुमार शाहाबादी ने गिरिडीह सीट जीती थी। लगातार दो विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी सुदिव्य कुमार सोनू ने अपना राजनीतिक काम जारी रखा। यही दौर उनके चुनावी संघर्ष का सबसे लंबा चरण माना जा सकता है—2009 की हार, फिर 2014 की हार और उसके बाद तीसरे प्रयास की तैयारी।
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2019 : तीसरे प्रयास में मिली विधानसभा की जीत
वर्ष 2019 का विधानसभा चुनाव सुदिव्य कुमार सोनू के राजनीतिक जीवन का बड़ा मोड़ साबित हुआ। उन्होंने एक बार फिर गिरिडीह सीट से चुनाव लड़ा और इस बार भाजपा के निर्भय कुमार शाहाबादी को हराकर पहली बार झारखंड विधानसभा पहुंचे। सुदिव्य कुमार सोनू को 80,871 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी निर्भय कुमार शाहाबादी को 64,987 वोट प्राप्त हुए। इस तरह करीब एक दशक तक चुनावी संघर्ष करने के बाद वे पहली बार विधायक बने। 2009 और 2014 में हार के बाद 2019 की जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इसी जीत ने उन्हें केवल संगठन के नेता से निकालकर विधानसभा की राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल कर दिया। 2019 में विधायक बनने के बाद सुदिव्य कुमार सोनू की राजनीतिक सक्रियता गिरिडीह के शिक्षा और विकास से जुड़े मुद्दों पर भी दिखाई दी। स्थानीय स्तर पर सर जेसी बोस विश्वविद्यालय की स्थापना की दिशा में पहल, पीरटांड़ क्षेत्र में बड़ी सिंचाई परियोजना तथा मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज से जुड़े प्रस्ताव उनके राजनीतिक एजेंडे में शामिल रहे। हालांकि इनमें से हर योजना किस स्तर तक पूरी हुई, यह अलग विषय है, लेकिन विधायक के रूप में शिक्षा और आधारभूत विकास के मुद्दे उनके प्रमुख राजनीतिक विषयों में शामिल रहे।
2024 में दूसरी बार जीते, मुकाबला रहा बेहद करीबी
वर्ष 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में सुदिव्य कुमार सोनू फिर गिरिडीह सीट से मैदान में उतरे। इस बार उनका मुकाबला एक बार फिर भाजपा के निर्भय कुमार शाहाबादी से हुआ। यह चुनाव 2019 की तुलना में काफी करीबी रहा। सुदिव्य कुमार सोनू को 94,042 वोट मिले, जबकि निर्भय कुमार शाहाबादी को 90,204 वोट प्राप्त हुए। यानी उन्होंने लगभग 3,838 वोटों के अंतर से चुनाव जीता।
इस जीत के साथ वे लगातार दूसरी बार गिरिडीह से विधायक बने। 2024 में दोबारा विधानसभा पहुंचने के बाद सुदिव्य कुमार सोनू को हेमंत सोरेन सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया। उनके पास एक साथ कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी थी। इनमें उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, नगर विकास एवं आवास, पर्यटन, कला-संस्कृति, खेल और युवा कार्य जैसे विभाग शामिल थे। गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र के राजनीतिक इतिहास में भी उनका मंत्री बनना महत्वपूर्ण था। झामुमो के टिकट पर गिरिडीह से चुनाव जीतकर मंत्री बनने वाले वे पहले नेता बने।
JPSC-JSSC विवाद के दौरान छात्रों से बातचीत
मंत्री के रूप में सुदिव्य कुमार सोनू की भूमिका वर्ष 2026 में उस समय विशेष रूप से सामने आई, जब झारखंड में JPSC और JSSC परीक्षाओं तथा भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर छात्रों का आंदोलन चल रहा था। उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री होने के कारण वे सरकार की ओर से छात्रों के साथ बातचीत करने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल रहे। परीक्षा रद्द करने, कुछ परीक्षाओं को स्थगित करने और जांच से जुड़े फैसलों की जानकारी छात्रों तक पहुंचाने की प्रक्रिया में उनकी भूमिका रही। राज्य सरकार और आंदोलनकारी छात्रों के बीच बातचीत के दौरान वे एक महत्वपूर्ण वार्ताकार के रूप में सामने आए।

6 सितंबर की सुबह थम गई यात्रा
6 सितंबर 2026 की सुबह सुदिव्य कुमार सोनू के निधन की खबर सामने आई। रिपोर्टों के अनुसार, देर रात गिरिडीह स्थित अपने आवास पर उनकी तबीयत बिगड़ी और सीने में दर्द की शिकायत के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया। उन्हें गिरिडीह के मर्सी अस्पताल पहुंचाया गया, जहां सुबह करीब 4 बजे उनका निधन हो गया। अलग-अलग शुरुआती रिपोर्टों में उम्र को लेकर भिन्न जानकारी सामने आई, लेकिन उनके राजनीतिक सफर की टाइमलाइन स्पष्ट है—1989 में झामुमो के प्राथमिक सदस्य के रूप में शुरुआत और 2024 में कैबिनेट मंत्री तक का सफर।
37 साल की राजनीतिक यात्रा का अंत
सुदिव्य कुमार सोनू की राजनीतिक यात्रा को कुछ महत्वपूर्ण पड़ावों में देखा जा सकता है-
1989- झामुमो के प्राथमिक सदस्य बने।
1992- गिरिडीह नगर झामुमो के संस्थापक अध्यक्ष बने।
2009- पहली बार गिरिडीह से विधानसभा चुनाव लड़ा, हार मिली।
2014- दूसरी बार विधानसभा चुनाव लड़ा, फिर हार मिली।
2019- तीसरे प्रयास में पहली बार विधायक बने।
2024- लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए और बाद में कैबिनेट मंत्री बने।
2026- JPSC-JSSC आंदोलन के दौरान छात्रों और सरकार के बीच बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
6 सितंबर 2026- निधन।
