पटना
बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी का उभार एक लंबी राजनीतिक यात्रा का परिणाम है। खास बात यह है कि वे कभी राबड़ी देवी की कैबिनेट में सबसे कम उम्र के मंत्री रह चुके हैं। वरिष्ठ समाजवादी नेता शकुनी चौधरी के बेटे सम्राट ने शुरुआती दौर से ही राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और कम समय में अपनी मजबूत पहचान बनाई। सम्राट चौधरी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद से की। इसके बाद वे जदयू और हम (से) होते हुए 2018 में भाजपा में शामिल हुए। उन्हें भाजपा में लाने का श्रेय सुशील मोदी को जाता है। पार्टी में शामिल होने के बाद उन्हें तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय की टीम में प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया।

प्रभावी नेता के रूप में
साल 2020 में एनडीए सरकार बनने पर सम्राट चौधरी को पंचायती राज मंत्री बनाया गया। 2022 में गठबंधन टूटने के बाद उन्हें नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी मिली, जहां उन्होंने अपने आक्रामक तेवर से सरकार को कई बार घेरा। उनके प्रदर्शन को देखते हुए मार्च 2023 में उन्हें संजय जायसवाल की जगह बिहार भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को मजबूत और धारदार बनाया। खासकर राजद और उसके नेतृत्व पर उनके हमलावर रुख ने उन्हें एक प्रभावी नेता के रूप में स्थापित किया। जनवरी 2024 में एनडीए की सरकार बनने पर उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया और वित्त एवं वाणिज्यकर विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस दौरान उन्होंने बजट में कई अहम घोषणाएं कीं। लोकसभा चुनाव में भी उनके नेतृत्व में भाजपा ने 12 सीटों पर जीत दर्ज की।

बेबाक और आक्रामक अंदाज
नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा उनके नेतृत्व में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और 89 सीटें जीतीं। उनकी कार्यक्षमता को देखते हुए उन्हें दोबारा उपमुख्यमंत्री बनाया गया। साथ ही, एनडीए के इतिहास में पहली बार गृह विभाग मुख्यमंत्री से हटाकर उन्हें सौंपा गया। सम्राट चौधरी अपने बेबाक और आक्रामक अंदाज के लिए जाने जाते हैं। नीतीश कुमार के विरोध में उन्होंने प्रतीकात्मक रूप से मुरेठा बांधा था, जो काफी चर्चा में रहा। हालांकि, जनवरी 2024 में एनडीए सरकार बनने के बाद उन्होंने अयोध्या में मुंडन कर मुरेठा उतार दिया।