अविनाश दास, मुंबई:
पकड़ी न थी किताब कि उस्ताद हो गये
हाथ आ गयी ग़ुलैल तो सय्याद हो गये
ता'मीर यूं हुए थे कि हैरान थे महल
उजड़े भी यूं कि सूरत-ए-बग़दाद हो गये
-हसनैन आक़िब
मैं मनोज मुंतशिर को नहीं जानता था। बाहुबली फ़िल्म आयी, तो पता चला इस फ़िल्म के हिंदी वर्ज़न के लिए मनोज मुंतशिर ने गीत लिखे हैं। फिर केसरी आयी, तो उसका गाना मिट्टी में मिल जावां मुझे बड़ा सही लगा। हालांकि दो दिन से किसी राजस्थानी गायिका की पुरानी रिकॉर्डिंग में लगभग एक ही तरह के बोल मार्केट में घूम रहे हैं। फिर मैंने शेमारू पर एक पूरी सीरीज़ देखी, जो मुंतशिर ने पेश की थी। पुराने गीतकारों पर थी वह सीरीज़। मुझे लगा कि ये कौन है, जो इतनी शिद्दत के साथ गीतों की सतह पर लगा पड़ा हुआ है और मैं क्यों इसे नहीं जानता हूं। फिर मुग़ल डकैतों वाले इनके प्रोमो ने इन्हें जानने के मेरे उत्साह पर पानी फेर दिया। फिर पता चला कि वाणी प्रकाशन से इनकी पुस्तक आयी है, “मेरी फ़ितरत है मस्ताना”। और दो दिन पहले ही पता चला कि इसमें मुंतशिर की कई लाइनें इधर उधर से मारी गयी है। फिर मैंने ख़ुद खोजबीन की, तो और भी चोरियों का पता चला।
बहरहाल, मुंतशिर ने कहा कि उन पर जो आरोप लगे हैं, वह सिद्ध हो गये, तो लिखना छोड़ देंगे। रामकुमार ने सलाह दी कि लिखना जारी रखो, बस चोरी करना छोड़ दो। चोरी और सीनाज़ोरी नहीं चलेगी। फिर उनका पाणिनी आनंद (आजतक) के साथ इंटरव्यू आ गया कि “मेरी कोई भी रचना मौलिक नहीं है। भारतवर्ष में सिर्फ़ दो ही मौलिक रचनाएं हैं, वाल्मीकि की रामायण और वेदव्यास की महाभारत। इसके बाद जो भी है, सब घूम-फिर के इन्हीं दो महाग्रंथों से प्रेरित है।”

प्रेरणा अलग चीज़ है मुंतशिर, लेकिन तुमने जो किया है, वह लगभग लगभग चौर्यकर्म है। मैं यहां कुछ चीज़ें रख देता हूं, तुम ख़ुद ही देख लो।
▪️Original Poet: Robert J Lavery
If one day you feel like crying
Call me
I don’t promise that
I will make you laugh
But I can cry with you
▪️Copycat Poet: Manoj Muntashir
तुम कभी उदास हो, रोने का दिल करे, तो मुझे कॉल करना। शायद मैं तुम्हारे आंसू न रोक पाऊं, पर तुम्हारे साथ रोऊंगा ज़रूर।
▪️Original Poet: Shakeel Azmi
मरके मिट्टी में मिलूंगा खाद हो जाऊंगा मैं
फिर खिलूंगा शाख़ पर आबाद हो जाऊंगा मैं
▪️Copycat Poet: Manoj Muntashir
तेरी मिट्टी में मिल जावां
गुल बनके खिल जावां
▪️Original Poet: Jawad Sheikh
अपने सामान को बांधे हुए इस सोच में हूं
जो कहीं के नहीं रहते वो कहां जाते हैं
▪️Copycat Poet: Manoj Muntashir
हम दीवानों का पता पूछना तो पूछना यूं
जो कहीं के नहीं रहते वो कहां रहते हैं
मैं इतना नहीं लिखना चाहता था, लेकिन लिख दिया है तो आप ख़ुद ही तय कर लीजिए कि ये प्रेरणा ही है या कुछ और। हो सकता है मेरी समझ उतनी गहरी नहीं हो।

तर्ज या ज़मीन पर रचने से मुझे कोई एतराज़ नहीं है। यह रवायत रही है। 1847 में गुज़र चुके हैदर अली आतिश का शेर है, “यार को मैंने मुझे यार ने सोने न दिया - रात भर ताला'-ए-बेदार ने सोने न दिया”। 1934 में पैदा हुए सुदर्शन फ़ाकिर ने लिखा, “इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया - वर्ना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया”। क़ैफ़ी आज़मी का शेर है, “मैं ढूंढ़ता जिसे हूं वो जहां नहीं मिलता - नयी ज़मीन नया आसमां नहीं मिलता”। इसी तर्ज पर निदा फ़ाज़ली ने लिखा, “कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता - कभी ज़मीं तो कभी आसमां नहीं मिलता”। मुनव्वर राना का शेर है, “किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आयी - मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आयी”। हमारे दोस्त आलोक श्रीवास्तव ने लिखा, “बाबूजी गुजरे; आपस में सब चीजें तक्सीम हुईं, तब- मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा”। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं। इसलिए सवाल भाव या ज़मीन को लेने-हड़पने का नहीं है, सवाल है कि आपके मन में उन शायरों के लिए कितना सम्मान है, जिनके काव्य ने आपको उन जैसा कहने के लिए प्रेरित किया!
अफ़सोस कि मनोज मुंतशिर इस मामले में कृतघ्न (Thankless) हैं। नुसरत की एक क़व्वाली है, “आंख उठी मोहब्बत ने अंगड़ाई ली - दिल का सौदा हुआ चांदनी रात में - उनकी नजरों ने कुछ ऐसा जादू किया - लुट गये हम तो पहली मुलाक़ात में”। अब टी सीरीज़ का एक अल्बम है, लुट गये। जुबिन नौटियाल का संगीत है और बोल हैं माननीय मनोज मुंतशिर के। बोल क्या हैं, हू ब हू वही पंक्तियां हैं, जो नुसरत की क़व्वाली में हैं, “आंख उठी मुहब्बत ने अंगड़ाई ली - दिल का सौदा हुआ चांदनी रात में - तेरी नजरों ने कुछ ऐसा जादू किया - लुट गये हम तो पहली मुलाक़ात मे”। उनकी नज़रों की जगह तेरी नज़रों का हेरफेर है बस। आप अलबम की डीटेल्स देख लीजिए, कहीं नुसरत को शुक्रिया तक नहीं कहा गया है। मुझे एक प्रसंग याद है। स्वानंद किरकिरे का एक दिन फ़ोन आया। बड़े बेचैन थे। कहा कि मसान फ़िल्म में दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल “मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूं - वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूं” की ज़मीन पर वरुण ग्रोवर ने एक गीत लिखा है। राइट्स कैसे मिलेंगे? मैंने निधीश त्यागी से बात करके उन्हें आलोक त्यागी का नंबर भेजा और आप फ़िल्म देखिए, बड़े अक्षरों में दुष्यंत कुमार जी का धन्यवाद ज्ञापन किया गया है। और वरुण ने क्या लिखा है, “मैं हूं पानी के बुलबुले जैसा - तुझे सोचूं तो फूट जाता हूं”! बहुत उम्दा!!

एक दोपहर कुमार विश्वास का फ़ोन आया कि साहित्य आजतक के कार्यक्रम में मनोज मुंतशिर के इस शेर पर उन्होंने जम कर दाद दे दी थी, “हम दीवानों का पता पूछना तो पूछना यूं - जो कहीं के नहीं रहते वो कहां रहते हैं”। दीवाना शब्द जहां आता है, कुमार दाद दे ही देते हैं... बहरहाल। बाद में जव्वाद शेख़ ने उनसे कहा कि भाई साब आप तो चोरी के शेर पर भी दाद देते हैं। फिर कुमार ने ही मुझे असल शेर सुनाया, “अपने सामान को बांधे हुए इस सोच में हूं - जो कहीं के नहीं रहते वो कहां जाते हैं”।
मेरी मनोज मुंतशिर से कोई दुश्मनी नहीं है। वो भला लड़का है, लेकिन आजकल ख़राब संगत में है। ये संगत उसको और ज़्यादा सीनाज़ोर बनाये, उससे पहले अपनी ख़ूबसूरत रचनात्मक विनम्रता में लौट आये बस। इतिहास और साहित्य को गहराई से जाने-समझे और जिनकी ज़मीन पर रचना वग़ैरा करने की इच्छा हो, उनको धन्यवाद कहना सीख जाए।

आजतक की वेबसाइट ने मनोज मुंतशिर के इंटरव्यू का जो टेक्स्ट डाला है, उसमें से एक बड़ा हिस्सा हटा दिया गया है। भला हो ख़ुद मनोज मुंतशिर का, जिन्होंने अपना अनसेंसर्ड वीडियो यूट्यूब पर डाल दिया। ख़ुद को ही कैसे एक्सपोज़ करते हैं, दोस्तो मनोज मुंतशिर से ये कभी मत सीखना। अपनी ही कविता को अपने से इसलिए अलग कर दिया, क्योंकि वह लोकप्रिय नहीं हुई, क्योंकि उसने पैसे कमा कर नहीं दिये। मैं अपनी तरफ़ से कुछ भी अतिरिक्त नहीं कह रहा हूं। सब कुछ ख़ुद मनोज मुंतशिर कह रहे हैं। पूरा वीडियो तो देख ही डालिए, लेकिन जो बात मैं रेखांकित कर रहा हूं, उसको टेक्स्ट में भी पढ़ डालिए।
▪️पत्रकार का सवाल
आप पर आरोप है कि आपने एक अंग्रेज़ी कविता का अनुवाद करके अपने नाम से छपवा दिया
▪️मनोज मुंतशिर का जवाब
सिर्फ़ एक? अरे ये बात तो मेरी हर कविता, हर गीत के बारे में कही जा सकती है। देखिए, चार सौ से ज़्यादा फ़िल्मी और ग़ैर फ़िल्मी गीत लिखे हैं मैंने। जिस किताब की बात की जा रही है, मेरी फ़ितरत है मस्ताना, उसी में दो सौ पन्ने और सैकड़ों रचनाएं हैं। अनगिनत बार देश के सबसे बड़े टीवी शोज़ पर कविताएं सुना चुका हूं, उनकी गिनती भी सैकड़ों में होगी! इतना बड़ा पहाड़ है रचनाओं का आपके सामने और आप सिर्फ़ चार लाइनें ढूंढ पायीं? वो भी उस कविता की, जिसका मेरे जीवन में कोई योगदान ही नहीं है! “मुझे कॉल करना” ”तेरी मिट्टी” थोड़ी है? “तेरी गलियां” थोड़ी है? “बाहूबलि” थोड़ी है? इस कविता के मेरे जीवन में होने न होने से क्या फ़र्क़ पड़ता है? ये एकदम ऐसे ही है, जैसे किसी करोड़पति पर आप दो सौ रुपये रिश्वत लेने का आरोप लगाएं। अरे वो दो सौ रुपये उसके लिए अहमियत क्या रखते हैं, जिसके लिए वो अपने रेपुटेशन को रिज़्क करेगा? इल्ज़ाम भी वैसा होना चाहिए कि विश्वसनीय लगे। इस पर तो हंसी आती है!!!

(परिचय बक़ौल लेखक -जन्म दरभंगा, बिहार में हुआ। प्राथमिक शिक्षा भी वहीँ से हुई। 1995 में पटना आना हुआ और 1996 से प्रभात खबर से जुड़ा। फिर दिल्ली जाना हुआ और वहां एक्ट वन (एक मशहूर थिएटर ग्रुप) से जुड़ा। आगे चल के “तरुण भारत संघ ” जो कि एक जल संरक्षण से जुडी संस्था है उनके साथ काम किया। मरी हुई नदियों के पुनर्जीवन की कहानिया लिखी जो की तरुण भारत संघ ने 5 वॉल्यूम्स में प्रकाशित भी की। और फिर मैं ’98 में वापस पत्रकारिता में आया। पत्रकारिता का सफर ऐसा रहा कि 2000 में प्रभात खबर का फीचर एडिटर बना, 2001 में प्रभात खबर के पटना संस्करण का एडिटर बना, फिर थोड़े दिन के लिए मैं दैनिक भास्कर में चला गया और उसके झाँसी संस्करण का संपादक बना फिर वापस से प्रभात खबर आ के मैंने उसका देवघर संस्करण लांच किया। 2005 में दुबारा दिल्ली की तरफ रुख किया और वहां NDTV के साथ मेरी 4-5 साल लंबी पारी चली। तब मैंने सोचा कि यार अब बहुत हो गया मीडिया, अब सिनेमा बनाया जाये। मैंने फिल्मों से जुड़े इवेंट शुरू किये और फाइनली एक स्क्रिप्ट लिखी और 24 मार्च 2017 को सामने आई “अनारकली ऑफ़ आरा”। अनारकली फिल्म के अलावा कई वेब सीरीज का निर्माण। गजल संग्रह जीवनकर्जागाड़ी है प्रकाशित। संप्रति मुंबई में रहकर फिल्म लेखन और निर्देशन।)
नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।