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क्यों बनी यह फिल्म कभी-कभी, जिसने जीते थे कई राष्ट्रीय पुरस्‍कार

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हिंदी फिल्मी इतिहास में कुछ फिल्म ऐसी बनी हैं, जिनकी अनदेखी कभी नहीं की जा सकती है। ऐसी  ही एक रूमानी फिल्म कभी कभी 1976 में आई थी। इसका निर्देशन और निर्माण यश चोपड़ा ने किया था। जबकि अपने अभिनय से कहानी को अमिताभ बच्चन, राखी, शशि कपूर, वहीदा रहमान, ऋषि कपूर, नीतू सिंह और सिमी गरेवाल आदि नामचीन कलाकारों ने जीवंत किया था। यह यश चोपड़ा की निर्देशक के रूप में दीवार के बाद दूसरी फिल्म थी, जिसमें अमिताभ बच्चन और शशि कपूर लीड रोल में थे। इसका एक गीत आज भी प्रेमी गुनगुनाते हैं, "कभी कभी मेरे दिल में ख्याकल आता है…..।" इसके संगीत के लिए खय्याम, गीत साहिर लुधियानवी और गायन के लिए मुकेश को सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार मयस्सर हुआ था। आज जानिये इसे डुपर-सुपर फिल्म के बनने की वजह।–संपादक
 

मनोहर महाजन, मुंबई:

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छांव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी  ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी
अजब न था कि मैं बेगाना-ए-अलम रह कर
तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता
तेरा गुदाज़ बदन तेरी नीमबाज़ आँखें
इन्हीं हसीन फ़सानों में मैं खो रहता
पुकारतीं मुझे जब तल्खियाँ ज़माने की
तेरे लबों से हलावत के घूँट पी लेता
हयात चीख़ती फिरती बरहना सर
और मैं घनेरी ज़ुल्फ़ों के साये में छुप के जी लेता
मगर यह हो न सका और अब ये आलम है
कि तू नहीं , तेरा ग़म , तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसे
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं।

 

साहिर लुधियानवी की उक्‍त मशहूर नज़्म पढ़ कर ही निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा को फ़िल्म 'कभी कभी' बनाने का विचार आया था। साहिर जैसे शायर के चरित्र को ध्यान में रख कर यश जी की पत्नी पामेला चोपड़ा ने एक प्रेमकथा लिखी। यश चोपड़ा ने उसे एक विशाल कैनवास पर चित्रित किया। फ़िल्म का संगीत पक्ष अत्यन्त सबल होना चाहिए इस बात को ध्यान में रखकर था इसका ज़िम्मा ख़य्याम साहब  को सौंपा गया. नतीजा? बाक्स-ऑफिस पर यह सबसे अधिक सफल फ़िल्म साबित हुई। फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, गीतकार और गायक के अवार्ड ख़य्याम, साहिर लुधियानवी और मुकेश को मिले थे। साहिर साहब की इस ओरिजिनल नज़्म का पाठ भी अमिताभ बच्चन की आवाज़ में  फ़िल्म में रखा गया था। पर फ़िल्म के लिये साहिर लुधियानवी ने इसमें कुछ फेरबदल कर  इसे नया रूप दिया था।

 

 

इस गीत से जुड़ी एक रोचक बात यह है कि कई बरस पहले इस गीत को ख़य्याम ने एक थोड़ी अलग धुन में सुधा मल्होत्रा और गीतादत्त की आवाज़ में रिकार्ड किया था। चेतन आनन्द ‘काफ़िर‘ नामक एक फ़िल्म बना रहे थे। उसके लिये साहिर और ख़य्याम की जोड़ी ने यह गीत बनाया था। वह फ़िल्म अधूरी रह गयी और गीत कभी लोगों के सामने नहीं आ पाया। बरसों बाद ख़य्याम ने साहिर की नज़्म को एक नई धुन में ढाल कर मुकेश और लता मंगेशकर की आवाज़ में रिकार्ड कराया। इस नज़्म रूपी गीत ने सफलता के झण्डे गाड़ दिये।

 

 

(मनोहर महाजन शुरुआती दिनों में जबलपुर में थिएटर से जुड़े रहे। फिर 'सांग्स एन्ड ड्रामा डिवीजन' से होते हुए रेडियो सीलोन में एनाउंसर हो गए और वहाँ कई लोकप्रिय कार्यक्रमों का संचालन करते रहे। रेडियो के स्वर्णिम दिनों में आप अपने समकालीन अमीन सयानी की तरह ही लोकप्रिय रहे और उनके साथ भी कई प्रस्तुतियां दीं।)

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।