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.....फिल्मी संसार को जिन्‍होंने लता मंगेशकर और किशोर कुमार से मिलवाया

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मनोहर महाजन, मुंबई:  
वह संगीतकार जिसने दुनिया को कंठकोकिला लता मंगेशकर और हरफ़नमौला किशोर कुमार से मिलवाया।नई पीढ़ी भले ही न जानती हो पर जो लोग 'भारतीय फिल्म संगीत' की विकास यात्रा से जुड़े रहे हैं बख़ूबी जानते हैं कि खेमचंद प्रकाश (1907-1950) का फिल्म-संगीत को क्या विशिष्ट योगदान है। फिल्मों में कई दिग्गज गायिकाओं के बीच जब लता मंगेशकर संघर्ष कर रही थीं और कोरस गा रही थीं तब उन्होंने उसका हाथ पकड़ कर उसे 'बेटी बनाकर'  नूरजहां के 'आभा मंडल' से निकाल कर लता मंगेशकर बनाया। खेमचंद प्रकाश ने उनसे लगातार पूर्वाभ्यास  कराके फ़िल्म 'जिद्दी' (1948) का "..चंदा रे जा रे जा.." गाना गवाया। यह पहला गाना था, जिसने लता मंगेशकर की आवाज को अलग पहचान दी। इसी फिल्म जिद्दी’ (1948) में उन्होंने सिंगिंग स्टार किशोर कुमार से  ‘मरने की दुआएं क्यूं मांगूं, जीने की तमन्ना कौन करे’ गवाकर  पहला ब्रेक दिया। इस तरह खेमचन्द प्रकाश ने हिन्दी फ़िल्म संगीत को दो ऐसे 'सितारे' दिए, जिनकी आवाज़ों की सुर-सरिता में  डुबकियां लगाते रहेंगे आज भी, कल भी और आने वाले कल भी। खेमचन्द प्रकाश के संगीत निर्देशन में जब कमाल अमरोही की फ़िल्म 'महल' (1949) ने लता जी की आवाज़ के लिए संभावनाओं का अनंत आसमान खोल दिया। अपनी जिस सर्वश्रेष्ठ रचना को खेमचंद प्रकाश फ़िल्म से हटाना चाहते थे। आज  दुनिया उन्हें उसी गीत से याद करती है। वो रचना थी 'आएगा आनेवाला।'

 

विरासत में मिला था संगीत

राजस्थान के सुजानगढ़ क़स्बे में जन्मे संगीतकार खेमचंद प्रकाश को संगीत  विरासत में मिला था। उनके पिता पंडित गोवर्धन प्रसाद जयपुर के महाराज माधो सिंह (द्वितीय) के दरबारी गायक थे। खेमचंद 19 बरस की उम्र में यहीं दरबारी गायक और  कत्थक-नर्तक बन गए। पर क़िस्मत में कुछ और ही बदा था। बीसवीं सदी में भारत के राजाओं और महाराजाओं की स्थिति ख़राब थी।जयपुर से निकलकर खेमचंद प्रकाश कुछ दिनों के लिए राजा गंगा सिंह के बुलावे पर बीकानेर चले गए। वहां मन नहीं लगा तो नेपाल के राजदरबार में गायक हो गए। कुछ समय बाद वहां से कलकत्ता आकर 'रेडियो रेडियो से जुड़ गए। यहां उनकी मुलाक़ात संगीतकार तिमिर बरन से हुई, जिन्होंने खेमचंद को ‘न्यू थिएटर्स’ के लिए अनुबंधित कर लिया।1935 में आई पहली ‘देवदास’ का संगीत तिमिर बरन का ही था। माना जाता है कि इसके गाने ‘बालम आये बसो मेरे मन में’ और ‘दुःख के दिन अब बीतत नाहीं’ खेमचंद ने ही कंपोज़ किये थे। हालांकि, इनके गीतकार केदार शर्मा इनका क्रेडिट महान कुंदन लाल सहगल को देते हैं।

 

स्ट्रीट सिंगर में पर्दे पर भी दिखलाई झलक

1938 में ‘न्यू थिएटर्स’ की एक और फ़िल्म आई थी स्ट्रीट सिंगर। वही जिसमें केएल सहगल ने ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए’ गाया था। इस फ़िल्म में एक हल्का-फुल्का गाना था ‘लो मैडम खा लो खाना।’ यह खेमचंद पर फ़िल्माया गया था। उन दिनों पृथ्वीराज कपूर अपनी थिएटर कंपनी ‘पृथ्वी थिएटर्स’ लेकर शहर-शहर घूमते थे। उन्होंने कलकत्ते में ये फ़िल्म देखी। वो खेमचंद की प्रतिभा पहचान गए और उन्हें बॉम्बे आने के लिए प्रेरित किया। 1939 के आसपास खेमचंद प्रकाश मायानगरी चले आये। उनके संगीत निर्देशन में 1939 में पहली फिल्म आई- ‘मेरी आंखें।’  इसी साल एक और फिल्म आई-‘गाजी सलाउद्दीन।’ जिसमें उन्होंने नौशाद को सहायक के रूप में रख कर ब्रेक दिया। खेमचंद प्रकाश के संगीत सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रही, फिल्म ‘तानसेन’ (1943)। इसमें के.एल सहगल और खुर्शीद के गाए गीतों ने धूम मचा दी। सहगल का 'राग दीपक' आधारित गीत ‘जगमग जगमग दिया जलाओ’ के लिए खेमचंद ने एक माह तक कठोर परिश्रम किया था। दीपक राग में यह आज भी अद्वितीय प्रयोग माना जाता है और हां, फ़िल्म तानसेन उद्योग की  महानतम फिल्मों में से एक थी, जिसने बैजू बावरा (1952), बसंत बहार (1956), संगीत सम्राट तानसेन (1959), रानी रूपमती (1960) और मीरा (1979) जैसी अन्य संगीतमय फिल्मो के लिए मार्ग प्रशस्त किया।इसी तरह  फ़िल्म महल के गाने,"..आएगा आने वाला " ने पूरी फ़िल्म में एक 'सिग्नेचर-ट्यून' के रूप में काम किया और इसी का अनुगमन बाद में आने वाली थ्रिलर फिल्मो :जैसे 'मधुमती', 'वो कौन थी' और 'मेरा साया' में देखा गया।

 

निधन के बाद पागल हो गई सेवा करने वाली नर्स

खेमचन्द प्रकाश का एक और महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उन्होंने फिल्मों में न केवल हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत तत्वों का इस्तेमाल किया बल्कि अपनी गीत सेटिंग में जलतरंग,पियानो और शहनाई का उपयोग करने वाले पहले संगीत निर्देशकों में से एक बन गए। बड़े बड़े संगीत धुरंधरों द्वारा खेमचन्द प्रकाश को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका हिंदी फिल्म संगीत में योगदान उनके द्वारा रचित गीतों से कहीं अधिक माना है। एक किंवदंती के अनुसार नेपाल के राजदरबार में गायक की नौकरी के दौरान खेमचंद एक बार बीमार हुए तो एक नेपाली नर्स ने उनकी बहुत सेवा की। कहा जाता है कि दोनों में प्रेम हो गया था। खेमचंद प्रकाश की पत्नी का निधन हो चुका था और उनके  आख़री दिनों में यह नर्स उनकी सेवा में जी जान से जुटी रही। जानकारों का कहना है कि खेमचंद प्रकाश के निधन के बाद यह नर्स पागल हो गई थी। कुछ जानने वालों ने मदद की कोशिश भी की, लेकिन उसने कोई मदद नहीं ली।कभी लोकप्रिय साहित्य के बेताज बादशाह रहे गुलशन नंदा ने उस नर्स और खेमचंद प्रकाश के जीवन को ले कर एक उपन्यास लिखा था- ‘सिसकते साज़. बाद में 1976 में इस पर‘महबूबा’ नाम से. एक फिल्म भी बनी थी.

15 साल में क़रीब 50 फिल्मों में संगीत

1935 से फिल्मों से जुड़े खेमचंद प्रकाश ने केवल 15 साल काम किया और उस दौरान उन्होंने क़रीब 50 फिल्मों में संगीत दिया। फ़िल्म 'महल' का संगीत खेमचंद प्रकाश के कॅरियर का सबसे बड़ा धमाका साबित हुआ। लेकिन वे अपनी यह धमाकेदार कायाबी नहीं देख पाए। 'महल' सिनेमाघरों में पहुंचने से दो महीने पहले 10 अगस्त, 1949 को उनका देहांत हो गया. तब वे सिर्फ 41 साल के थे। आज खेमचन्द प्रकाश की 72 वीं पुण्यतिथि पर हम इस महान आत्मा  संगीतकार को नमन करते है।
ज़माना बड़े गौर से सुन रहा था
तुम्हीं सो गए दास्ताँ कहते कहते।।

(मनोहर महाजन शुरुआती दिनों में जबलपुर में थिएटर से जुड़े रहे। फिर 'सांग्स एन्ड ड्रामा डिवीजन' से होते हुए रेडियो सीलोन में एनाउंसर हो गए और वहाँ कई लोकप्रिय कार्यक्रमों का संचालन करते रहे। रेडियो के स्वर्णिम दिनों में आप अपने समकालीन अमीन सयानी की तरह ही लोकप्रिय रहे और उनके साथ भी कई प्रस्तुतियां दीं।)

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।