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सच्चिदानंद सच्चू को नवाज़ा जाएगा पहला लक्ष्मी-हरि स्मृति उपन्यास सम्मान

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द फॉलोअप टीम, सुपौल: 

मैथिली और हिंदी के युवा लेखक-पत्रकार सच्चिदानंद सच्चू को पहले 'लक्ष्मी-हरि स्मृति उपन्यास सम्मान' से नवाज़ा जाएगा। यह सम्‍मान उनके मैथिली उपन्‍यास 'लालटेनगंज' के लिए दिए जाने की घोषणा अंतिका प्रकाशन की तरफ से कोसी प्रतिष्ठान के चेयरमैन और कथाकार-संपादक गौरीनाथ ने की है। मैथिली में आमंत्रित पांडुलिपियों के आधार पर यह सम्‍मान दिया जा रहा है। तीन सदस्यीय निर्णायक मंडल में कमलानंद झा, मीना झा और अकबर रिज़वी शामिल हैं। कथाकार-आलोचक और महालक्ष्मी-हरिदास के पुत्र श्रीधरम ने बताया कि 28 सितंबर को चनोरा गंज, झंझारपुर में सम्मान समारोह आयोजित किया जाएगा। मौके पर 'लालटेनगंज' उपन्यास के साथ ही हरिदास की आत्मकथा 'जनम जुआ मति हारहु' का भी विमोचन होगा। चनोरा गंज लक्ष्मी-हरिदास की कर्मभूमि रही है। बता दें कि सच्चिदानंद सच्चू का जन्म 6 सितंबर, 1978 को  हटाढ़ रुपौली जिला मधुबनी में हुआ। 'अल्लाह हो राम' उपन्यास इनकी चर्चित कृति है। पत्रकारिता से सम्बद्ध सच्चू की पहचान जनधर्मी रचनाकार की रही है। 

 

चार उपन्यासों की पांडुलिपि विचारार्थ आई थी: गौरीनाथ
चयन समिति के संयोजक गौरीनाथ ने बताया कि उनके पास चार उपन्यासों की पांडुलिपि इस सम्मान के लिए विचारार्थ आई थी। निर्णायकों के पास उन्होंने नाम हटाकर उपन्यास भेजा था। उनमें से किसी को न उपन्यासकार का नाम मालूम था, ना निर्णय से जुड़े दूसरे सदस्यों के नाम। गौरीनाथ ने बताया कि सम्मान की गरिमा और अंतिका की ईमानदार छवि को ध्यान में रखते हुए हर स्तर पर पारदर्शी निर्णय का ध्यान रखा गया है। अंतिम क्षण में ही तीनों निर्णायक ऑनलाइन एक दूसरे के सामने आए जब सर्वसम्मति से श्रेष्ठ उपन्यास के रूप में 'लालटेनगंज' का चयन हुआ। 'लालटेनगंज' धनबाद-झरिया के कोयला खदान में काम करने वाले कामगार परिवारों की जिंदगी पर केंद्रित उपन्यास है। जहां पेट की आग से बेहाल मजदूर दहकते कोयले की आग में जिंदगी गर्क करने से नहीं डरते हैं। इससे पहले सच्चिदानंद सच्चू का, देश विभाजन और मिथिला समाज में मुसलमानों की स्थिति पर एक यादगार उपन्यास 'अल्लाह हो राम' प्रकाशित हो चुका है।

 

कोलियरी जिंदगी की काली सच्चाई से रूबरू कराता उपन्‍यास: कमलानंद झा
निर्णायक मंडल के प्रमुख सदस्य अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और चर्चित आलोचक कमलानंद झा ने कहा कि 'लालटेनगंज' उपन्यास धनबाद-झरिया इलाके की कोलियरी जिंदगी की काली-स्याह सच्चाई से रूबरू कराता है। मैथिली उपन्यास परम्परा में यह उपन्यास  विषय की ताजगी और ट्रीटमेंट की नवता के लिए  जाना जाएगा। महज दो जून की रोटी के लिए प्रत्येक क्षण अपनी जिंदगी को दांव पर लगाने वाले खदान के दिहाड़ी महदूरों के संघर्ष रोंगटे खड़े करने वाले हैं।  इस खदान में मौत बहुत सस्ती है। सभी इसी आशंका और दहशत में जीते हैं कि कल किसका घर पाताल में चला जाएगा। लालटेनगंज  की स्त्रियां कोलियरी के लम्पटों से निपटने में सक्षम हैं।  सुगिया और किशोरी के रूप में दो सशक्त स्त्री चरित्र का गढ़न उपन्यास को स्त्री-दृष्टि-सम्पन्न भी बनाता है। दो नितांत विपरीत चरित्र की स्त्री में बहिनापा को लक्षित कर उपन्यासकार ने स्त्री-विमर्श को नयी दिशा देने की कोशिश की है।

 

अपने कंस्ट्रक्ट और संरचना में उपन्यास बहुत ही लाजवाब: अकबर रिज़वी

फिल्म-निर्माण और थिएटर से जुड़े दूसरे निर्णायक अकबर रिज़वी ने कहा  कि लाल्टेनगंज की ख़ूबी यह है कि इस उपन्यास में जीवन की रागात्मकता, संघर्ष, जीवट तीनों का ताना-बाना कुछ इस क़दर बारीक और गझिन है कि इसको अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। सिस्टम अपने पारम्परिक स्वरूप और संरचना में है। जीवन अपने को बेहतर करना चाहता है और इसके लिए सिस्टम से थोड़ा मानवीय होने की उम्मीद रखता है। इसके लिए संघर्ष करता है और आजीविका का संकट ऐसा है कि ज़मीन के नीचे धधकती आग भी उसको भयभीत नहीं करती।  सच कहूँ तो यह उपन्यास अपने कंस्ट्रक्ट और संरचना में बहुत ही लाजवाब है। कथा-भूमि बिल्कुल गर्म है, और उस पर प्रेम और मित्रता जैसे मूल्यों की पड़ती फुहार एक अलग ही क़िस्म का लोभ जगाती है जो ठीक वैसी है, जैसे घर में आपका पसंदीदा भोजन बन रहा हो, चूल्हें से उठने वाला धुँआ आपकी आँखों और नाक-गले को परेशान कर रहे हों, लेकिन जिह्वा आस्वाद की कल्पना में रत् मन वहाँ से हटने को तैयार न हो।

 

जटिल प्रश्नों से जूझता एक प्रमाणिक दस्तावेज : मीना झा

कथा-लेखिका मीना झा ने उपन्यास के बारे में कहा कि उपन्यास ‘लालटेनगंज’ कोयलांचल झरिया के श्रमिक समाज और समय  के जटिल प्रश्नों से जूझता एक प्रमाणिक दस्तावेज  है। लालटेन कोयलांचल की जलती धरती के तल और अतल दोनों को प्रकाशित करने का एक बिम्ब है। लेखक ने उपन्यास में श्रमिक वर्ग की पीड़ा, संघर्ष, भयानक कार्यस्थल और दयनीय स्थिति की तस्वीर ही नहीं, संवेदनशील सूक्ष्म चित्रकारी की है। जलस्रोत खुदिया जोरिया का अग्निस्रोत में परिवर्तित हो जाना, अगियावैताल का रूपक, ऐना कोलियरी की चासनाला जैसी दुर्घटना, मजदूर बस्तियों  के  सजीव चित्रों के कई रंग इस चित्रकारी में शामिल हैं। मैथिली के लिए नयी एवं मजदूरों की भाषा में कही गयी कथावस्तु, सम्यक कथा विन्यास, सुसंबद्ध संयोजन, कथाक्रम की तार्किक परिणति के लेखकीय कौशल द्वारा पूंजीवादी निर्ममता को सघनता से उद्घाटित करती है। लालटेनगंज अनायास फ्रेंच उपन्यासकार एमिल ज़ोला के ‘जर्मिनल’ की याद दिलाता है।