राजेश चंद्र, दिल्ली:
"यह कहना कि कला का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है, अपने आप में एक राजनीतिक वक्तव्य है।"
-जॉर्ज ऑरवेल, 1903-1950
"जनता को मुक्त करना ही कला का उद्देश्य है, इसलिये कला मेरे लिये मुक्ति का विज्ञान है।"
-जोसेफ बेय्यूस, 1921-1986
कला और राजनीति के सम्बंध पर सैकड़ों बार बात हुई है। ज़ाहिर है दोनों को अलग नहीं कर सकते। अच्छी कला अच्छी राजनीति है और बुरी कला बुरी राजनीति। अच्छी कला हिंसा, घृणा, सांप्रदायिकता, सामाजिक विभेदों, झूठ, पाखंड और हर प्रकार के अन्याय के ख़िलाफ़ मुखर होती है। वह अपनी शक्ति को संगठित करते हुए इनसे मुठभेड़ करती है और जनता को शिक्षित करने के दायित्व को भी निभाती चलती है।
बुरी कला के दो रूप हैं। एक में वह खुल कर ताक़तवर के पक्ष में, हिंसा, घृणा, अन्याय और सामाजिक विभेदों के पक्ष में मुखर होती है। दूसरे में भी उसकी पक्षधरता पहले के समान ही होती है, पर उस पर एक झीना आवरण पड़ा रहता है, जो बुरी कला के अभ्यासकों को आवश्यकता पड़ने पर सन्देह का लाभ दिलाता है। इस कला का अभ्यास करने वाले कलाकार या रंगकर्मी इतनी चालाकी कर पाने में सक्षम हो जाते हैं कि वे केवल कला-कला, विशुद्ध कला का जाप करते रहें और इसकी आड़ में सत्ताधारियों की चाकरी कर अधिकतम सुविधाएं हासिल कर लेने की अपनी राजनीति को आसानी से ज़ाहिर न होने दें।
ऐसे कलाकारों की राजनीति को समझने के लिये सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता होती है। उनकी पहचान ऐसे समय में उजागर हो जाती है, जब समाज और मनुष्यता चौतरफ़ा संकटों से घिरी हो, अन्याय और उत्पीड़न करने वाली शक्तियां पूरी तरह से प्रत्यक्ष हो जायें, और कलाकार या रंगकर्मी से यह अपेक्षा हो कि वह खुल कर, मुखर होकर समाज और मानव-विरोधी, विभेदकारी शक्तियों के ख़िलाफ़ और जनता के पक्ष में खड़ा होकर आवाज़ उठाये। बिम्बों, प्रतीकों में बात न कर एकदम सीधी बात करे जिससे जनता का सीधा जुड़ाव हो और उसे सामयिक संकटों से निकलने की कोई स्पष्ट दिशा मिले।
ऐसा नहीं करते हुए फूलों, पत्तियों, सूक्तियों, मुहावरों, प्रतीकों, बिम्बों और कविताओं की अमूर्तता के माध्यम से सांकेतिक या द्विअर्थी या इधर-उधर की बातें करने वाले और जनता को उलझाने वाले कलाकार या रंगकर्मी कला और समाज के घोर शत्रु होते हैं। वे घुन और दीमकों की तरह कला और उसकी सामाजिक भूमिका को अंदर से खोखला करते रहते हैं, चाट जाते हैं। एक सच्चे कलाकार और रंगकर्मी को कला और समाज के बाहरी शत्रुओं के साथ-साथ भीतरी शत्रुओं से भी उसी ताक़त और प्रतिबद्धता के साथ लड़ना चाहिये। इन दोनों मोर्चों पर एक साथ लड़ाई लड़े बग़ैर कला और समाज की मुक्ति संभव नहीं है।
(राजेश चन्द्र दिल्ली में रहते हैं। विगत 27 वर्षों से कविता, रंगकर्म, समीक्षा, संपादन, पत्रकारिता और अनुवाद के क्षेत्र में निरन्तर सक्रिय।विभिन्न मानवाधिकार संगठनों एवं जनान्दोलनों के साथ जुड़ाव। रंगमंच पर केन्द्रित एकमात्र गैर-सांस्थानिक पत्रिका समकालीन रंगमंच का 2013 से संपादन-प्रकाशन।)
नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।