मनोहर महाजन, मुंबई:
मेरे पिया गए रंगून, वहां से किया है टेलीफोन पिया की याद सताती है....पुराने दौर के इस गीत की लचक में आज भी लोग थिरक उठते हैं। राजेंद्रकृष्ण के लिखे इस गीत को शमशाद बेगम और चितलकर ने सी. रामचंद्र के संगीत में अपने स्वरों में सजाया था। फिल्म थी, पतंगा। यह 1949 में प्रदर्शित हुई थी। इस सदाबहार नग़मे को गोप और निगार सुल्ताना के संग फ़िल्माया गया था। फिल्म के निर्देशक थे हरनाम सिंह रवैल, जिन्हें अक्सर एच. एस. रवैल (21 अगस्त 1921 - 17 सितंबर 2004) के नाम से जाना जाता है। और जिनकी आज 100वीं जयंती है। लायलपुर, पंजाब में जन्मे हरनाम सिंह ने कई फ़िल्मों की पटकथाएँ लिखीं और दोरांगिया डाकू (1940) के साथ एक निर्देशक के रूप में शुरुआत की। उनकी लगातार तीन फिल्में; शुक्रिया (1944), ज़िद (1945) और झूठी कसमें (1948); व्यावसायिक विफलताएं थीं। उनकी अगली फिल्म पतंगा (1949) सफल रही और 1949 की सातवीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली बॉलीवुड की फिल्म थी। बाद में 1949 से 1956 तक रवैल की लगातार 9 फिल्म बनाईं पर वो बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाईं। मार्च 1956 में रवैल ने दो नई परियोजनाओं के साथ शुरुआत की।

मीना कुमारी के साथ 'चालबाज' और वैजयंतीमाला के साथ 'बाजीगर' पर दोनों फिल्में अंततः बंद कर दी गईं। रवैल ने तीन साल का विश्राम लिया और 1959 में राज कुमार, किशोर कुमार और मीना कुमारी अभिनीत कॉमेडी फिल्म 'शरारत' के साथ वापसी की। उनकी अगली दो फिल्में थी:देव आनंद और वहीदा रहमान अभिनीत 'रूप की रानी चोरों का राजा' (1961)। मनोजकुमार और सईदा खान अभिनीत और 'कांच की गुड़िया (1963)। इससे पहले कई असफल फिल्मों में अभिनय करने के बाद फिल्म ने मनोज कुमार को इस फ़िल्म ने पहचान दिलाई। रवैल को बड़ी सफलता 1963 में राजेंद्र कुमार और साधना की संगीतमय फिल्म 'मेरे महबूब' से मिली. राजेन्द्र कुमार ने इससे पहले रवैल के सहायक निदेशक के रूप में काम किया था।

फिल्म संघर्ष (1968) बंगाली लेखिका महाश्वेता देवी के एक उपन्यास पर आधारित थी। यह फिल्म 19वीं सदी में सेट की गई थी और इसमें डाकुओं के जीवन को दिखाया गया था। दिलीप कुमार, वैजयंतीमाला, बलराज साहनी, संजीव कुमार और जयंत जैसे अभिनेताओं द्वारा "असाधारण प्रदर्शन" के लिए इसकी प्रशंसा की गई। अभिनेता-निर्देशक राकेश रोशन ने इस फिल्म में सहायक निर्देशक के रूप में काम किया था। राजेश खन्ना और लीना चंदावरकर अभिनीत उनकी अगली फिल्म महबूब की मेहंदी (1971) ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया और राजेश खन्ना की लगातार 17वीं हिट फिल्म बनी। उनकी 1976 की फिल्म 'लैला मजनू', जिसमें ऋषि कपूर और रंजीता कौर मुख्य भूमिका में थेसफल रही। रवैल की आख़िरी फ़िल्म 'दीदार- ए-यार' (1982) बुरी तरह फ्लॉप रही। इसके बाद उन्होंने फिल्म उद्योग से संन्यास ले लिया।

(मनोहर महाजन शुरुआती दिनों में जबलपुर में थिएटर से जुड़े रहे। फिर 'सांग्स एन्ड ड्रामा डिवीजन' से होते हुए रेडियो सीलोन में एनाउंसर हो गए और वहाँ कई लोकप्रिय कार्यक्रमों का संचालन करते रहे। रेडियो के स्वर्णिम दिनों में आप अपने समकालीन अमीन सयानी की तरह ही लोकप्रिय रहे और उनके साथ भी कई प्रस्तुतियां दीं।)
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