मनोहर महाजन, मुंबई:
1974 के मध्य में रेडियो सिलोन छोड़ने के बाद जब मैंने तब की बम्बई और आज की मुम्बई में आवाज़ की दुनिया में बतौर फ्रीलांसर प्रवेश किया तो छुटपुट रेडियो प्रोग्रामों के बाद मुझे 'बैंक ऑफ बड़ौदा' द्वारा स्पोंसर्ड रेडियो प्रोग्राम "पत्थर बोल उठे" में भाग लेने का अवसर मिला। इसमें भारत के ऐतिहासिक स्थलों की गाथाओं का नाट्यरूपान्तर पेश किया जाता था। इसकी रिकॉर्डिंग वर्ली स्थित "रेडियो कमर्शियल" नामक स्टूडियो में होती थी जिसकी स्थापना उस दौर की मशहूर आवाज़ शील कुमार और रेडियो के एक प्रशंंसक कैलाश गोयल ने की थी जो बाद में टूटकर "रेडियो जेम्स" और "रेडियो वाणी" बना। इस प्रोग्राम को विनोद शर्मा जी डायरेक्ट करते थे। ये वही विनोद शर्मा हैं जिन्होंने आल इंडिया रेडियो में रहकर "हवा-महल" के अनेकानेक नाटकों को अपनी परफॉर्मेंसेस से सफलता की बुलंदियों पर पहुंचाया। विविध भारती के बेहद मक़बूल प्रायोजित प्रोग्राम "कोहिनूर गीत गुंजार" और "इंस्पेक्टर ईगल" को अपनी आवाज़ से हरदिल अज़ीज़ प्रोग्राम बनाया। "जो बीबी से करे प्यार-वो प्रेस्टीज से कैसे करे इनकार".. "देगी मिर्च का तड़का अंग अंग फड़का.." "..दूध से सफेदी निरमा से आये.."...विनोद जी की क़लम से निकले वो 'विज्ञापन' हैं जो आज भी अपना सानी नहीं रखते। "..झुमका गिरा रे, बरेली के बाज़ार में..आशा भोसले के गाये इस गाने के बीच-बीच में सवाल पूछती वो लासानी पुरुष आवाज़ भी विनोद शर्मा की ही थी।

इस प्रोग्राम में भाग लेने वाले कुछ कलाकारों में शामिल थे मुकेश खन्ना। जिन्होंने बाद में सीरियल "महाभारत" में भीष्म पितामह के रोल को साकार किया। कई फिल्मों में काम किया और टीवी पर "शक्तिमान" बन कर बच्चों को प्रेरित किया। मशहूर हिंदी न्यूज़ रीडर देवकीनंदन पांडे के पुत्र सुधीर पांडे से भी मेरी मुलाक़ात इसी प्रोग्राम में हुई जो बाद कई फिल्मों और सीरियलों में अभिनय करते दिखे। यहीं पर मेरी मुलाक़ात ग़ज़ल के बेताज बादशाह जगजीत सिंह से हुई जो इस प्रोग्राम की रिकॉर्डिंग के समय मौजूद रहते थे और सबसे अहम बात! जगजीत सिंह ने ही इस कार्यक्रम की सिग्नेचर ट्यून कम्पोज़ की थी। इस प्रोग्राम में एक ऐसे शख़्स भी हिस्सा लेते थे जिनकी लम्बी सफेद दाढ़ी थी, जो बड़े ही ख़ामोश तबियत के अपने काम से काम रखते वाले इंसान लगते थे..आये..रिहर्सल की..रिकॉर्डिंग की..और रुख़सत..उन्हें ज़्यादातर उर्दूभाषी किदारों के लिये बुलाया जाता था। उनकी खरजदार, गुंजीली आवाज़ में बोले गये संवाद कविता जैसे लगते थे। मैं उनकी आवाज़ से बेहद मुतासिर था। पांच छह रिकॉर्डिंग के बाद भी मेरा उनसे बोलचाल या परिचय न हो पाया, जबकि बाकी सब लोगों के साथ मैं मिक्स हो गया था।
एक दिन विनोद शर्मा से मैंने उनके बारे में पूछा- "विनोद जी,वो जो सफ़ेद दाढ़ी वाले सज्जन हैं जिनसे आप अक़्सर भारी-भरकम उर्दू वाले किरदार ही करवाते हैं,कौन हैं?"
अरे! तुम उन्हें नहीं जानते?"
"नहीं!"- मैंने इंकार में सर हिलाया.
"अरे वो गुलाम मस्तफ़ा दुर्रानी है!"
"गुलाम मस्तफ़ा दुर्रानी?"
" अरे G.M. दुर्रानी"?
"वो मशहूर प्ले-बैक सिंगर जिन्होंने चालीस के दशक में धूम मचा दी थी?"
"हाँ भई हाँ.. और जिनका नाम तुम कई बार रेडियो सिलोन से लेते रहे हो!!.." मैं मुँह बाये उन्हें देखता रहा। इतने दिनों से जिस गायक की आवाज़ का मैं दीवाना था, जिनके सैंकड़ों गाने मैं अपने रेडियो प्रोग्रामों में बजा चुका था। उनके साथ मैं पिछले कई हफ़्तों से नाटकों में काम कर रहा था!! वाओ! मैं अपने भाग्य पर यक़ीन नहीं कर पा रहा था। विनोद ने जब मेरा उनसे फॉर्मल परिचय कराया, तो दुर्रानी साहब ने अपने हाथ में मेरा हाथ लेकर कहा कि वो रेडियो सिलोन पर मेरे द्वारा प्रस्तुत प्रोग्राम"आपके अनुरोध पर" और "कल और आज" सुनना कभी नहीं भूलते थे, तो मैं गदगद हो गया। ये रेडियो प्रोग्राम क़रीब साल भर चला और रिकॉर्डिंग के दौरान मुझे उनको बहुत क़रीब से जानने का मौक़ा मिला। बहुत सारी छोटी-छोटी मुलाक़ातों के बाद दुर्रानी साहब के जीवन के बारे में जो कुछ भी जान पाया उसे मैं आप सब संगीत-प्रेमियों के साथ शेअर करने जा रहा हूँ, जो उस अज़ीम शख़्सियत को मेरी विनम्र श्रद्धान्जलि होगी।

G.M. दुर्रानी का जन्म 1919 में पेशावर में हुआ था। दुर्रानी की खोज फिल्म निर्माता सोहराब मोदी ने की थी। उन्होंने 1936 में उन्हें अपने एक ऐतिहासिक नाटक 'सैद-ए-हवस' में गाने का पहला मौक़ा दिया जो आग़ा हश्र कश्मीरी लिखे नाटक का रिकॉर्डेड प्रारूप था। संगीत निर्देशक शास्त्रीय संगीतकार बुन्दू खान "तान-तलवार" बुन्दू खान के नाम से लोकप्रिय थे। दुर्रानी का पहला गाना एक ग़ज़ल था: "मस्तों को ऐन फ़र्ज़ है पीना शराब का।"
बाद में जब पार्श्व गायन की अवधारणा आरम्भ हुई तो उन्होंने सबसे पहले 'बहुरानी' नामक फिल्म के लिए अपनी आवाज़ दी। ये फिल्म सागर मूवीटोन द्वारा बनाई गई थी और इसके संगीत निर्देशक रफ़ीक़ गज़नवी थे। दुर्रानी तब ऑल इंडिया रेडियो में "पूर्णकालिक कलाकार" के रूप में काम कर रहे थे. वो अंग्रेजों का ज़माना था और उन्हें कोई भी निजी-रिकॉर्डिंग करने की अनुमति नहीं थी। लेकिन रफ़ीक़ गज़नवी ये 'पर्टिकुलर गाना' उन्हीं से गवाना चाहते थे। अपनी नौकरी को सुरक्षित रखने के लिए दुर्रानी ने कुछ शर्तें रखीं जैसे; रिकॉर्डिंग रविवार रात को हो, किसी भी बाहरी व्यक्ति को स्टूडियो में प्रवेश करने की अनुमति न हो। 'क्रेडिट टाइटल' या 'रिकॉर्ड' पर उनका नाम न हो...बहरहाल उनकी सारी शर्तों के तहत वो गीत एक एंग्लो-इंडियन महिला गायिका के साथ एक युगल गीत के रूप में रिकॉर्ड हुआ और इसके एवज़ में उन्हें मिले 75 रुपये, जबकि 'आल इंडिया रेडियो' पर उनका मासिक वेतन मात्र 70 रुपये था।

इसके बाद उन्होंने दिसंबर 1940 में रेडियो की नौकरी छोड़ दी और अपने आप को पूरी तरह 'प्ले बैक' को समर्पित कर दिया। उन्होंने 'मिर्ज़ा ग़ालिब', 'हमलोग', 'मग़रूर', 'शमा', 'नमस्ते', और 'सबक़' जैसी सुपरहिट फ़िल्मों के लिए ख़ुर्शीद अनवर, नौशाद, शंकर राव व्यास और ए.आर.कुरैशी (अल्ला रक्खा) जैसे प्रसिद्ध संगीत-निर्देशकों के लिए गाया और लोकप्रियता के बेहद ऊंचे मुक़ाम पर जा बैठे। कई गायकों ने उनके साथ अपने करियर की शुरुआत की और उन्होंने कई अन्य गायक-गायिकाओं को भी प्रेरित किया। इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि भारतीय फ़िल्म संगीत के स्तभ मोहम्मद रफी ने उनका अनुसरण किया। उन्होंने अपना पहला हिंदी गीत भी जीएम दुर्रानी के साथ गाया था..फ़िल्म थी 'गाँव की गोरी' (1944)..संगीतकार थे श्याम सुंदर और बोल थे:"..अजी दिल हो क़ाबू में..।" ज़ोहराबाई अम्बालावाली से लेकर सुरैया, उमादेवी, सितारा, शमशाद बेगम, नूरजहां, खान मस्ताना और अमीरबाई कर्नाटकी: कोई भी ऐसे गायक गायिका नहीं थे जिन्होंने दुरानी के साथ ना गाया हो। लता मंगेशकर (चाँदनी रात) और गीता दत्त ने भी (दो भाई) अपने करियर की शुरुआत दुर्रानी के साथ गाये ड्यूएट के ज़रिये ही की थी।

वैसे तो G.M. दुर्रानी की भाषा 'पश्तो' थी। लेकिन हिंदी और उर्दू के अलावा वो पंजाबी भी बहुत अच्छी तरह से जानते थे। G.M. दुर्रानी ने 30 से 50 तक के दशक में इन सभी भाषाओं में गाया। गानों के अलावा उनके गाये भजन भी काफ़ी प्रसिद्ध हुए। संगीत प्रेमियों को यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि उन्होंने गुलाम मुस्तफा दुर्रानी के नाम से 4 हिंदी फिल्मों के लिए संगीत भी दिया था। ये फिल्में हैं: अंगूरी (1943),विजयलक्ष्मी (1943) भाग्यलक्ष्मी (1944) और धड़कन (1946)। इसके अलावा G.M.Durrani ने 'गुंजन ’के नाम से 1961 में दो और फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया था। ये दो फ़िल्में हैं "किस्मत पलट के देख" और "स्टेट एक्सप्रेस।" अन्य गायकों की तरह G.M. दुर्रानी ने उस दौर के महानतम गायक कुन्दनलाल सहगल की गायन-शैली का पालन न करते हुए एक पार्श्व गायक के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की। उन्होंने हर किस्म के गाने गाये: दर्दीले, रोमांटिक, देशभक्ति के, नात हो या क़व्वाली, ग़ज़ल या भजन। वह हिंदू भक्ति गाने वाले पहले मुस्लिम गायकों में से एक थे। G.M. दुर्रानी उस समय के सबसे वरिष्ठ पंजाबी गायक-अभिनेता भी थे।

1930 के दशक के अंत में हिंदी फिल्मों में अभिनेत्री के रूप में अपना करियर शुरू कर कुछ उल्लेखनीय फिल्मों : औरत (1940) डॉक्टर (1941) जवानी (1942) धड़कन (1942) और आखिरी फ़िल्म शादी के बाद (1949) की प्रसिद्ध अभिनेत्री ज्योति, असली नाम सितार बेगम अद्भुत आवाज़ के मालिक और हैंडसम पठान GM दुर्रानी से उन्हें प्यार हो गया और जल्द ही दोनों शादी के बंधन में बंध गये। ज्योति गायिका-अभिनेत्री वहीदन की छोटी बहन थीं, जिन्होंने 'अलीबाबा' सहित कई फिल्मों में गाये और अभिनय किया था। वहीदन की ही बेटी थी निम्मी जो 1950 के दशक में एक बड़ी अभिनेत्री बनी। 50 का दशक आते आते G.M. दुर्रानी इतने बड़े गायक बन चुके थे कि धुन पसंद ना आने पर संगीतकार को मुँह पे ही बोल दिया करते थे:“..पहले मेरे लायक धुन बनाना सीख लो तब रिहर्सल पर बुलाया करो।” 'रिहर्सल' या 'रेकॉर्डिंग' का टाइम कुछ भी हो, दुर्रानी जाते अपने ही टाइम से थे…ज़ाहिर है बड़े और सफल गायक होने की वजह से प्रोड्यूसर्स और संगीतकार उनकी इस लेट-लतीफ़ी को बर्दाश्त भी करते थे। उस दौर में इनके पास तीन-तीन गाड़ियां हुआ करती थीं जिसमें एक में बकायदा ‘बार’ बना हुआ था फिल्म ‘शराबी’ के विक्की बाबू की गाड़ी की तरह.वो पहले गायक थे जिन्हें बम्बई के सड़कों पर 'खतरनाक तीव्र गति' से 'रेड कलर की स्पोर्ट्स-कार' दौड़ाते हुए देखा जा सकता था।

इतने ऊंचे मुक़ाम पर पहुंचने के बाद ऐसे क्या वजूहात बने कि शोहरत की बुलंदियों पर खड़े G.M. दुर्रानी को रेडियो प्रोग्रामों और छोटे-मोटे जिंगल गाकर अपना गुज़ारा करना पड़ रहा था! अपनी पहचान छुपानी पड़ रही थी ! इसके पीछे बहुत से किस्से कहानियां प्रचलित हैं। कुछ जानकारों का कहना है कि नाम और शोहरत को वो पचा नहीं पाए..कुछ मानते हैं कि उनका नवाबी रख-रखाव और रंगीन-मिज़ाजी उनके आड़े आई। कुछ अन्यों का मानना है कि दूसरों को कमतर समझने और उन पर तंज कसने की आदत ने उन्हें कहीं का न छोड़ा...और एक कहानी तो इतने नाटकीय ढंग से फैलाई गई है कि पूछिये मत!! वो कहानी कुछ यूं है: "..एक बार नौशाद साहब एक ड्यूएट गाने की रिकॉर्डिंग कर रहे थे। GM दुर्रानी के साथ गा रही थी एक नयी लड़की ‘लता मंगेशकर।’ फिल्म थी ‘चाँदनी रात’ (1949) और गाना था:"..हाय छोरे की जात बड़ी बेवफ़ा..." रोमांटिक गाना था। दुर्रानी कुछ उच्छ्रंखल और रोमांटिक हुए जा रहे थे। उस दौर में रेकॉर्डिंग में सिर्फ़ दो हो माइक इस्तेमाल होते थे: एक गायकों के लिये और दूसरा सारे साजिंदों के लिये। बहरहाल दोनों दुर्रानी और लता आमने-सामने खड़े होकर गा रहे थे। अपने हिस्से का गाना गाने के बाद दुर्रानी ‘शरारत’ पर उतर आते। नौशाद साहब ने जाकर दुर्रानी को समझाया: ".भाई अपना हिस्सा गाकर चुपचाप खड़े हो जाया करो..लड़की नयी है…नर्वस हो रही है..” पर लता जितना 'नर्वस' नहीं हो रही थी उससे ज्यादा ‘अपमानित’ महसूस कर रही थी।

एक दूसरी रिकॉर्डिंग में भी जो नौशाद साहब की ही थी दुर्रानी फिर कुछ ऐसी ही गुस्ताख़ी कर बैठे। शुरू से ही सफेद साड़ी पहनने वाली लता मंगेशकर से कह बैठे :"..लता ये क्या तुम रोज़-रोज़ सफेद धोतियां लपेटकर चली आती हो। रेकॉर्डिंग में ज़रा शोख़ लिबास में आया करो.." लता जी को इस बात पर बड़ा गुस्सा आया...और उन्होंने नौशाद साहब से जाकर कहा : 'मैं इस आदमी के साथ गाना नही गाऊंगी' बिना इस बात की परवाह किये कि 'नम्बर वन गायक' के साथ गाने से मना करने पर उसके नये-नये करियर पर क्या असर पड़ेगा। नौशाद साहब ने भी लता जी को समझाया: “लता अभी तुम नयी हो..इन बातों को इग्नोर करो..तुम्हारी आवाज इतनी अच्छी है कि तुम्हें आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता...जब स्थापित हो जाओगी तब अपने मन की करना..”.लेकिन इस अपमान से लता जी के रोम रोम में आग लगी हुई थी। उन्होंने नौशाद साहब से इतना ही कहा:“..ये गाना ना गाने पर आप मुझे माफ़ तो कर देंगे ना..". नौशाद साहब ने रेकॉर्डिंग कैंसिल कर दी। माना जाता है कि इस वाक़ये के बाद पहले से जिन संगीतकारों ने लता-दुर्रानी को ध्यान में रखकर धुनें बनाई थीं, उन्होंनें गायक बदल दिये। संयोग या दुर्भाग्य की बात है कि इस घटना के बाद से ही जी.एम. दुर्रानी का पतन शुरू हुआ और देखते ही देखते वो गुमनामी के अंधेरों में खो गये।
पर मुझसे बातों के दौरान इस किस्से को GM दुर्रानी ने बिल्कुल बेबुनियाद बताया और कई मिसालें दी."फ़िल्म चांदनी" के जिस गाने का ज़िक्र इस किस्से में किया गया है वो सन 1949 में जारी हुई थी। दूसरे जिस गाने के बारे में कहा गया है उसका तो न अफवाह फैलाने वालों को इल्म है, न नौशाद साहब को और न ही मुझे। अगर लता मंगेशकर ने उस तथाकथित घटना के बाद मेरे साथ गाने से इनकार कर दिया था तो उसके बाद के वर्षों में बनी फिल्मों में उन्होंने मेरे साथ क्यों गाया? मसलन: फ़िल्म 'एक थी लड़की' का गाना- "लारा लप्पा लारा लप्पा" फ़िल्म 'शायर' का गाना-'दो बिछड़े हुए दिल" फ़िल्म 'मांग' (1950) का गाना-"आओ बैठो बात सुनो" फ़िल्म 'हमलोग' का गाना- "गाये चला जा" फ़िल्म आनंद भवन (1953) का गाना-"हेलो हेलो मिस्टर दिल", फ़िल्म 'शिकार' (1955) का गाना-"क्या हाल है हुज़ूर के दिल का " फ़िल्म "कारवां"(1956) का गाना-"ऐ सारबां,किस राह का राही है तू।" जब मैंने अस्ल वजह जाननी चाही तो GM दुर्रानी ने कहा : "दर असल मैं फ़िल्म दुनिया की ताम-झाम और भौतिकवाद से ऊब गया हूँ। हज के बाद से मुझमें एक अजीब सा बदलाव आ गया है, मेरा झुकाव आध्यात्ममिक-चीज़ों की ओर ज़्यादा हो गया है। मैने अपने फिल्म करियर को दरकिनार कर दिया...फिल्मी लोगों से बचना शुरू कर दिया। दाढ़ी रखने लगा ताकि कोई मुझे कोई पहचान न सके।" ये सही है कि उन्होंने सब कुछ त्याग दिया, अपनी सारी जायदाद बेचकर फ़कीरों को बांट दी और अंत में अपनी एक्ट्रेस भांजी निम्मी के वर्ली स्थित बंगले के एक छोटे से कमरे में रहने लगे।

एक शो के दौरान मशहूर गायक मन्नाडे से बातों बातों में बीते दौर के गाने वालों की चर्चा छिड़ गई जिसमें दुर्रानी साहब भी शामिल थे। उनके अनुसार: "दुर्रानी-जी की आवाज़ बेहद मधुर थी, लेकिन उनमें मानसिक-शक्ति का अभाव था। वे एक गायक के रूप में जीवित रहने में विफल रहे. सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचने के के बाद उस पर बने रहने के लिए व्यावहारिक होना भी आवश्यक होता है और यहीं पर दुर्रानी-जी कमज़ोर पड़ गए और अपने आप को एक गायक के रूप में ज़िंदा नही रख पाये। जब एक निर्माता अपनी फ़िल्म पर लाखों-करोड़ों खर्च करता है, तो वह अपनी टीम में सभी सदस्यों से अपेक्षा करता है कि वह फ़िल्म को सफल बनाने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करे जिसके अभाव में एक कलाकार के अकेले पड़ जाने की पूरी संभावना होती है. ठीक यही, दुर्रानी-जी के साथ भी हुआ। उनके करियर के इस तरह ख़तम हो जाना सचमुच बेहद खेद की बात है।" घंटों तक संगीतकारों को इंतजार करवाने वाले G.M. दुर्रानी 80 के दशक में रेडियो प्रोग्रामों में मिलने वाली छोटी-मोटी भूमिकाओं के लिये वक्त से पहले पहुँच जाया करते थे, जहाँ कलाकारों को अधिकतम 100 रुपये पारिश्रमिक मिला करता था। अपनी कार में "बार" लेकर चलने वाले दुर्रानी साहब इन दिनो कई बार ‘वरली नाका’ के बस स्टैंड पर बीड़ी पीते हुए बस का इंतजार करते हुए भी देखे जाते थे।
सही कहा है किसी ने- "काल का पहिया घूमे रे भैया, लाख तरह इंसान चले, लेके चले बारात कभी तो, कभी बिना सामान चले। 8 सितंबर 1988 को मुम्बई में इस सूरज का अस्त हो गया। उनके गाये कुछ चुनिंदा सदाबहार गाने जो आज भी मुझ जैसे संगीत-प्रेमियों की धडकनों में समाये हुए हैं। नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे-फ़िल्म नई कहानी (1943), हाथ सीने पे जो रख दो -मिर्ज़ा साहिबां (1947), दो बिछड़े हुए दिल-शायर (1949), लारा लप्पा लारा लप्पा-एक थी लड़की (1949), हज़ारो ख्वाहिशें ऐसी-घायल (1950) और नज़र फेरो न-दीदार (1951) आदि ऐसे ही सदाबहार गीत हैं।

(मनोहर महाजन शुरुआती दिनों में जबलपुर में थिएटर से जुड़े रहे। फिर 'सांग्स एन्ड ड्रामा डिवीजन' से होते हुए रेडियो सीलोन में एनाउंसर हो गए और वहाँ कई लोकप्रिय कार्यक्रमों का संचालन करते रहे। रेडियो के स्वर्णिम दिनों में आप अपने समकालीन अमीन सयानी की तरह ही लोकप्रिय रहे और उनके साथ भी कई प्रस्तुतियां दीं।)
नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।