logo

कॉमरेड, कांग्रेस, कन्हैया और बेगूसराय को जो नहीं जानते

13318news.jpg

प्रेम कुमार, बेगूसराय: 

बेगूसराय के लिए कम्युनिस्ट से कांग्रेस गमन कोई नई घटना नहीं है। बेगूसराय की राजनीति के भीष्म पितामह माने जाने वाले स्व. भोला सिंह 1967 में वाम समर्थित उम्मीदवार के तौर पर ही बेगूसराय विधानसभा का चुनाव निर्दलीय जीते थे। उन्होंने 1972 में सीपीआई की टिकट पर भी बेगूसराय से विधानसभा का चुनाव जीता। फिर तत्कालीन कम्युनिस्ट नेताओं और पार्टी से अपने मतभेदों के चलते कम्युनिस्ट पार्टी छोड़ कर 1977 में कांग्रेस में शामिल हो गए। उसके बाद भी लगातार विधायक बने, मंत्री रहे फिर लालू प्रसाद के जलवे के समय राजद में गए और अंततः भाजपा में आकर बेगूसराय से सांसदी भी जीते।

 

आठ बार वो बेगूसराय से विधायकी जीते। लगभग पचास साल तक भोला सिंह बेगूसराय की राजनीति के केंद्रीय व्यक्तित्व बने रहे। भोला सिंह संघर्षों में तपे और मँजे हुए विशुद्ध राजनीतिज्ञ थे न कि किसी नामी विश्वविद्यालय का टैग लगा कर टीवी कैमरों के रास्ते लाँच किए गए प्रीमेच्योर धुमकेतूनुमा नेता। और तब से अब तक सिमरिया की गंगाजी में भी बहुत पानी बह चुका। जब हमलोग जेएनयू से वास्ता रखते थे। तब एक कहावत खूब चलती थी,
"जेएनयू का कम्युनिज्म गंगा ढाबे से शुरु होता है और प्रिया सिनेमा के इर्दगिर्द फैली रंगीनियों में दम तोड़ देता है।" प्रिया सिनेमा जेएनयू के बिल्कुल पास बसंतकुंज में स्थित एक बेहद पॉश और हाईफाई रंगीनियों में डूबा मार्केटिंग कॉम्प्लेक्स था।

 

उसी जेएनयू से उभरे और कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर बेगूसराय से डायरेक्ट सांसदी का चुनाव लड़ और हार चुके कन्हैया कुमार ने अपने एसी सहित कांग्रेस का दामन थाम लिया है। अपनी बदहाली से जूझती कांग्रेस को उनमें अपना मुक्तिदाता भले नजर आता हो लेकिन बेगूसराय के लोगों को कम से कम ऐसी कोई गलतफहमी नहीं होगी। क्योंकि भोला सिंह के समय से लेकर आज तक राजनीति जिले में 360 डिग्री पर घूम चुकी है। उस समय आजादी के बाद कुछ ही समय बीते थे, सो कम्युनिस्टों में भी बदलाव और क्रांति का उफान था। जिसमें आधा बेगूसराय उतराता रहता था। बाकी का आधा बेगूसराय अपनी जर-जमीन पर कम्युनिस्टों से मंडराने वाले खतरे के मद्देनजर कांग्रेस को सर पर उठाए घूमता था।

 

उदारीकरण के बाद बीते लंबे अरसे में बाजार और पूँजी के हाहाकारी वेग ने बेगूसराय में भी लोगों का जीवन बदला, प्राथमिकताएँ बदलीं और जर-जमीन पर मंडराने वाले पुराने खतरों को अप्रासंगिक कर दिया। ऊपर से इन सबों के मिले जुले प्रभाव ने आज बेगूसराय में भी राष्ट्रवाद और धर्म का ऐसा जलवा कायम कर दिया है जिसमें जिले की बहुसंख्यक आबादी आज भगवा में भगवान की ओर ही टकटकी लगाए है। सो कन्हैया भी भोला सिंह की तरह बरास्ते कांग्रेस जबतक भाजपा में नहीं पँहुचते तबतक भविष्य कोई खास उजला तो नहीं कहा जा सकता है। देखना दिलचस्प होगा कि ऐसा होता है और होता भी है तो कबतक। बाकी कांग्रेस उनको अगर डायरेक्ट राष्ट्रीय नेता के तौर पर प्रोजेक्ट कर दे तो ये उनका भाग्य। क्योंकि ऐसे में बेगूसराय उनके लिए कोई खास मायने नहीं रखेगा जो उनके लिए ज्यादा माकूल साबित होगा।

 

प्रेम कुमार ने बिहार में अपराध और राजनीति पर सिलसिलेवार लिखा था। आप उन्‍हें 

सभी8 किस्‍त पढ़ने के लिए अलग-अलग लिंक पर क्‍लिक करें:

  •  
  • (प्रेम कुमार बिहार के बेगूसराय में रहते हैं। स्‍वतंत्र लेखन करते हैं।)
     
    नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।
  •