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कपूर ख़ानदान से क्‍या था फ़िल्म और टीवी एक्टर सुबिराज का रिश्‍ता

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मनोहर महाजन, मुंबई:

एक ज़माने के मेरे बेहद क़रीबी मित्र फ़िल्म और टीवी एक्टर सुबिराज की आज सालगिरह है। बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि 90 से अधिक फिल्मों और15  से अधिक लोकप्रिय टीवी धारावाहिक में काम करने के बावजूद मेरे इस मित्र के बारे में 'गूगल' पर आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। बस कुछ छुटपुट जानकारियां इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं। मुझे थोड़ा-बहुत जो उनके बारे में मालूम है, वो मैं आज उनके 'जन्मदिवस' पर आपके साथ बांटना चाहता हूँ। सुबिराज जिन्हें कई जगह "सुब्बिराज" नाम से संबोधित किया गया है- बॉलीवुड के एक लंबे इतिहास से जुड़े महान कपूर परिवार संबंधित थे। वह पृथ्वीराज कपूर की बहन के बेटे और राज कपूर, शम्मी कपूर और शशि कपूर के ममेरे भाई थे। बतौर अभिनेता उनकी पहली फिल्म "दो गुंडे" (1959) थी। उस समय वे कपूर परिवार के मशहूर आर.के.स्टूडियो में स्टूडियो मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। इस पद के साथ साथ उन्होंने अपनी अभिनय-यात्रा भी जारी रखी।

 

उन्होंने हिंदी सिनेमा के लगभग सभी प्रसिद्ध फिल्म निर्देशकों जैसे "बासु चटर्जी," "देव आनंद," "संतोष पीपत," "शोमू मुखर्जी," "केवल शर्मा" आदि के साथ काम किया है।1986 में रिलीज़ फिल्म "एक रुका हुआ फैसला" में उनके अभिनय के लिए उन्हें समीक्षकों और दर्शकों दोनों की प्रशंसा मिली। इस फ़िल्म में उन्होंने एक अभिमानी, पाखंडी, बेईमानी और आक्रामक व्यवसायी की भूमिका निभाई थी। यह फिल्म 'सिडनी लुमेट' की फिल्म "ट्वेल्व एंग्री मेन" की रीमेक थी। 1991 में उन्होंने "माँ की ममता" नाम की एक और फिल्म में अभिनय किया, जो एक बड़ी हिट साबित हुई थी. उनकी कुछ अन्य लोकप्रिय फिल्में 2000 में "खिलाड़ी 420", 1999 में "इंटरनेशनल खिलाड़ी", 1996 में "राम और श्याम" आदि हैं। उन्होंने 1965 में राज कपूर की एक क्लासिक, फ़िल्म 'बूट पोलिश' की प्रसिद्ध अभिनेत्री बेबी नाज़ से शादी की, जिन्हें 1955 के कान फिल्म समारोह में फ़िल्म 'बूट पोलिश' में उनकी भूमिका के लिए एक विशिष्ट पुरस्कार मिला था. उनकी पत्नी नाज़ उनकी दो फिल्मों में उनकी सह कलाकार थीं, 1963 में "देखा प्यार तुम्हारा" और 1965 में "मेरा घर मेरे बच्चे।"

सुबिराज ने नब्बे से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। उन्होंने दस से अधिक फिल्मों में एक 'पुलिस आयुक्त' के रूप में और आठ फिल्मों में एक 'न्यायाधीश' के रूप में अभिनय किया। ज्यादातर फिल्मों में उन्होंने एक अनुशासित 'पिता' या 'ससुर' की भूमिका निभाई। "मुकद्दर का फैसला," "अव्वल नंबर," "अग्नि साक्षी," "सनम तेरी कसम," "पसंद अपनी अपनी," "गुनाहों का देवता," "एक लड़की एक लड़की," "राम और श्याम," आदि फिल्मों में भी सुबिराज ने अहम किरदार निभाए। सुबिराज ने 15 से अधिक टीवी धारावाहिकों में अभिनय  भी किया। इनमें प्रमुख हैं:  "पीछा करो' (1990) "विरासत", (1999) "चट्टान" और "लाइफ ओ.के" और "एक नई उम्मीद रोशनी - सीजन 2" (2000)। 1983-84 के आसपास सुबिराज रेडियो से भी बड़े समर्पित भाव से जुड़े। 

 

रेडियो के मेरे एक प्रायोजित कार्यक्रम "धड़कन" जो मैं 'एक्साइड बैटरी' बनाने वालों के लिए करता था, उसमें वो 'सूबेदार बुंदेला' का रेगुलर रोल करते थे।इस रेडियो नाट्य-धारावाहिक ने 'Ad Club of India' का बेस्ट रेडियो स्पोंसर्ड प्रोग्राम का अवार्ड भी जीता था। इसके बाद वो मेरे ज़्यादतर रेडियो प्रोग्रामों का हिस्सा रहते थे। हँसमुख, दिलदार और 'डाउन टू द अर्थ।' सुबिराज बहुमुखी प्रतिभा के मालिक थे.उन्होंने जिस तवज्जो और लगन के साथ फिल्मों और टीवी में काम किया उतने ही समर्पण के साथ और रेडीओ में  काम किया। तीनों माध्यमों में काम करना उन्होंने अपनी मृत्यु तक जारी रखा।उनके दो बेटे हैं जिनका फिल्म उद्योग से कोई संबंध नहीं है।19 अक्टूबर 1995 में उनके सामने  उनकी पत्नी बेबी नाज़ की मृत्यु हो गई थी। 19 जुलाई 2007 में इस बहुमुखी प्रतिभा से मालामाल मेरे इस प्यारे दोस्त सुबिराज ने आख़री सांस ली। जिनकी यादें आज भी मेरे ज़हन में महफूज़ हैं।

 

(मनोहर महाजन शुरुआती दिनों में जबलपुर में थिएटर से जुड़े रहे। फिर 'सांग्स एन्ड ड्रामा डिवीजन' से होते हुए रेडियो सीलोन में एनाउंसर हो गए और वहाँ कई लोकप्रिय कार्यक्रमों का संचालन करते रहे। रेडियो के स्वर्णिम दिनों में आप अपने समकालीन अमीन सयानी की तरह ही लोकप्रिय रहे और उनके साथ भी कई प्रस्तुतियां दीं।)

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।