दिल्ली:
भारत में डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों पर चेतावनी शब्द अब तक नहीं लिखा जा रहा था लेकिन बीते कुछ सालों में अल्प प्रसस्कृत (अल्ट्रा प्रोसेस्ड) डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की खपत में जबरदस्त उछाल देखने मिला है। ऐसे में उद्योग जगत अब डिब्बा बंद सामान के फ्रंट पैक पर चेतावनी लिखने के लिए तैयार है।

वैधानिक चेतावनी लिखने से क्या बदलेगा!
प्रमुख उद्योग प्रतिनिधियों और खाद्य उत्पाद निर्माताओं का मानना है, कि वैश्विक बाजार में छोटे और मझोले औद्योगिक (एसएमई) इकाइयों द्वारा उत्पादित खाद्य पदार्थों की बढ़ती लोकप्रियता भारत के परंपरागत खाद्य पदार्थ के निर्यात के लिए माकूल माहौल बन चुका है। ऐसे खाद्य पदार्थ सेहत के दृष्टिकोण से भी बेहतर हैं। अगर डिब्बे के आगे के हिस्से पर चेतावनी लिखने की नीति अपनाई जाती है, तो ऐसे सामानों के निर्यात में क्रांतिकारी कदम साबित होंगे।

विदेशी निवेश आकर्षित करने में मदद मिलेगी!
खाद्य उद्योग कल्याण संघ (FIWA) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. गिरीश गुप्ता ने कहा कि, भारतीय खाद्य पदार्थ को वैश्विक बाजार के समकक्ष बनाने के लिए विश्व स्तर पर सबसे प्रचलित एफओपीएल को अपनाने की आवश्यकता है। एफओपीएल (FOPL) देश में फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की काफी मदद करेगा, जिससे बाजार अथवा डिमांड स्वस्थ खाद्य पदार्थों की तरफ मुड़ेगा। यह भारत के लिए एख अनोखा अवसर होगा, जो भारतीय फूड प्रोसेसिंग उद्योग को आगे बढ़ाने और अधिक विदेशी निवेश को आकर्षित करने में मदद करेगा।

13 वर्षों में 42 गुना बढ़ गया है खुदरा बाजार!
यूरोमॉनिटर के वर्ष 2006-2019 बिक्री के आंकड़ों के अनुसार, भारत में पैकेज्ड फूड और सॉफ्ट ड्रिंक का खुदरा बाजार सिर्फ 13 वर्षों में 42 गुना बढ़ गया है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, जिसे भारत सरकार रोजगार सृजन के लिए एक प्रमुख क्षेत्र के रूप में प्रोत्साहित कर रही है, हालिया वर्षों में यह $ 200 अरब का कारोबार कर रही है. भारतीय खाद्य बाजार का एक तिहाई हिस्सा 'प्रसंस्करण उद्योग' का है।

लेबल पर पोषक तत्वों की जानकारी देनी होगी!
इस मुद्दे पर बात करते हुए व्यापारी एकता मंडल के रमाकांत जायसवाल ने कहा कि, भारत एक ‘ट्रेंड सेटर’ बन सकता है, यदि यह आगे बढ़कर एम्स द्वारा सुझाए गए 'हाई इन' स्टाइल चेतावनी लेबल को अपना लेता है। इस लेबल के डिजाइन के अनुसार खाद्य उत्पादों के पैकेट के सामने के लेबल पर पोषक तत्वों की साफ-साफ जानकारी दी जानी चाहिए, जैसे कि वसा, चीनी या नमक की मात्रा। उन्होंने कहा कि एक अनुमान के मुताबिक, साल 2030 तक भारत के उपभोक्ता 6 ट्रिलियन डॉलर प्रेसेस्ड फूड पर खर्च करने जा रहे हैं। ऐसे में इनके पैकेट पर उस पदार्थ की पूरी जानकारी का होना, उपभोक्ताओं के हित में है. इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

लाखों उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य का सवाल
वहीं भारतीय व्यापार मंडल के राष्ट्रीय अध्यक्ष अंकुर सिघल के मुताबिक, इस पहल से सिर्फ व्यापार को ही बढ़ावा नहीं मिलेगा, बल्कि देश के लाखों उपभोक्ताओं को स्वास्थ्य लाभ भी मिल सकेगा। इससे ऐसी बीमारियां कम होंगी। मानवाधिकार जन निगरानी समिति के, डॉ. लेलिन रघुवंशी का कहना है कि, ‘'चेतावनी लेबल' को अपनाना चाहिए जो कि न केवल गंभीर बीमारी को रोकने के लिए जरूरी है, बल्कि तेजी से बढ़ते खाद्य बाजार के बेहतर भविष्य के लिए भी फ़ायदेमंद है।”
