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परंपरा : असम के गांधिया गांव में कठपुतली नृत्य की लुप्त होती परंपरा को बचाने में जुटे कई ग्रुप

 असम के गांधिया गांव में कठपुतली नृत्य की लुप्त होती परंपरा को बचाने में जुटे कई ग्रुप

द फॉलोअप डेस्क

कठपुतली नृत्य (Puppet Dance), असम (Assam) की सबसे पुरानी लोक कलाओं (Folk Arts) में से एक है और यह राज्य की सांस्कृतिक विरासत (Cultural Heritage) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्तमान समय में पश्चिम नलबाड़ी (West Nalbari) का गांधिया गांव (Gandhia Village), इस लुप्त होती परंपरा (Vanishing Tradition) को बचाने के प्रयासों के एक केंद्र के रूप में उभरा है। यहां कई ग्रुप (Groups) इस विधा को बचाने के लिए सक्रिय हैं। बता दें कि इस विधा में कलाकार (Artists) धागों (Strings) और बांस की लकड़ियों (Bamboo Sticks) की मदद से पर्दे के पीछे कठपुतलियों (Puppets) में जान फूंकते हैं और उनके जरिए कहानियां (Stories), लोक कथाएं (Folktales), गीत (Songs), कविताएं (Poems) और धार्मिक नाटक (Religious Plays) पेश करते हैं। कभी ग्रामीण और शहरी दोनों समुदायों (Rural and Urban Communities) में लोकप्रिय रही यह पारंपरिक कला (Traditional Art), आज आधुनिक प्रभावों (Modern Influences) के चलते अपनी लोकप्रियता खोती जा रही है।

कठपुतली कला की विरासत कई दशकों पुरानी

गौरतलब है कि पश्चिम नलबाड़ी गांव में कठपुतली कला की विरासत कई दशकों पुरानी है। पश्चिम डेकापारा चुबुरी के कलाकार हरिचरण डेका के नेतृत्व में एक समूह ने पूरे असम में प्रदर्शन किए थे, लेकिन 1970 के दशक में उनकी गतिविधियां बंद हो गईं। साल 2004 में, मैकेनिकल इंजीनियर अजय कुमार शर्मा और उनके भाई विजय शर्मा ने स्थानीय निवासियों के साथ मिलकर ओज़ापारा चुबुरी में 'नटराज पपेट थियेटर' की स्थापना की। इस समूह को संगीत नाटक अकादमी से आर्थिक मदद मिली, जबकि इसके सात कलाकारों को असम सरकार की 'कलाकार कल्याण योजना' के तहत 50,000-50,000 रुपये की सहायता राशि दी गई। 2011 से 2019 के बीच, इस समूह को कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय उत्सवों में पहचान मिली। पारंपरिक कठपुतली कला को बचाने में दिए गए योगदान के लिए, इस समूह को 2025-26 के लिए संस्कृति मंत्रालय की फेलोशिप मिली है।

प्रणब शर्मा ने 'वासुदेव पपेट डांस' नाम का समूह शुरू किया
साल 2008 में, कलाकार प्रणब शर्मा ने 'वासुदेव पपेट डांस' नाम का एक और समूह शुरू किया। इनके कार्यक्रमों में पारंपरिक ढोल की थाप के साथ कृष्ण जन्माष्टमी और 'विप्र दामोदर' जैसी प्रस्तुतियां शामिल हैं। इस समूह ने गुवाहाटी के पांडु में आयोजित 'राष्ट्रीय कठपुतली महोत्सव' और 'रामधेनु महोत्सव 2024' में हिस्सा लिया है। हालांकि, इन्हें अभी तक असम सरकार से कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली है। साल 2018 में हरधन चक्रवर्ती और धीरेन शर्मा द्वारा शुरू किए गए 'मां मनसा पपेट थियेटर' में पारंपरिक तकनीकों के साथ-साथ आधुनिक तत्वों का भी इस्तेमाल किया जाता है। इनके नाटकों में 'मां मनसा', 'दुर्गा पूजा निर्मली' और 'सपोन एटी बेया सपोन' जैसी प्रस्तुतियां शामिल हैं। इन प्रस्तुतियों को पूरे असम में अलग-अलग जगहों पर मंचित किया गया है और दर्शकों ने इन्हें काफी सराहा है।

Tags - Assam Puppetry Culture Heritage Tradition