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पारंपरिक रीति-रिवाज और मांदर-नगाड़ों की थाप के बीच ऐतिहासिक मुड़मा जतरा का हुआ शुभारंभ

पारंपरिक रीति-रिवाज और मांदर-नगाड़ों की थाप के बीच ऐतिहासिक मुड़मा जतरा का हुआ शुभारंभ

मांडर

आस्था (Faith) की गूंज, मांदर-नगाड़ों (Traditional Drums) की थाप, पारंपरिक रीति-रिवाजों (Traditional Customs) और मेले (Fair) की रौनक के बीच ऐतिहासिक मुड़मा जतरा (Historic Mudma Jatra) का शुभारंभ मंगलवार को हुआ। शक्ति खूंटा स्थल (Shakti Khunta Site) पर पारंपरिक सरना रीति-रिवाज (Traditional Sarna Rituals) से पूजा-अर्चना (Worship) के साथ शुरू हुए इस दो दिवसीय जतरा (Two-day Jatra) में आदिवासी समाज (Tribal Community) की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत (Rich Cultural Heritage), धार्मिक आस्था (Religious Faith) और सामाजिक एकजुटता (Social Unity) की झलक देखने को मिली। सदियों पुरानी परंपरा (Centuries-old Tradition) को संजोए मुड़मा जतरा पहले दिन से ही अपने पूरे रंग में नजर आया। मंगलवार देर शाम सरना धर्मगुरु बंधन तिग्गा की अगुवाई में 40 पड़हा के महतो, पाहन, पुजार, पनभरा, कोटवार सहित अन्य धार्मिक अगुवाओं ने पारंपरिक बाजे-गाजे के साथ शक्ति खूंटा स्थल पहुंचकर विधिवत पूजा-अर्चना की। इसके बाद मुख्य मंच पर रखे कलश के समक्ष दीप प्रज्वलित कर जतरा के विधिवत शुभारंभ की घोषणा की गई। इस दौरान सरना धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने मुड़मा जतरा के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसकी परंपराओं को अक्षुण्ण बनाए रखने की अपील की। कार्यक्रम का संचालन रवि तिग्गा ने किया।

विवादों को हल करने का पवित्र स्थल है शक्ति खूंटा

मुड़मा स्थित शक्ति खूंटा आदिवासी समाज के लिए विशेष धार्मिक और सामाजिक महत्व रखता है। प्रचलित ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, जब आदिवासी समाज के लोग रोहतासगढ़ से छोटानागपुर आए थे, तब मुड़मा में उरांव और मुंडा समुदाय के बीच समझौता हुआ था। इसी मान्यता के कारण शक्ति खूंटा को आदिवासी समाज का पवित्र स्थल माना जाता है। इसे समाज की सर्वोच्च पारंपरिक न्याय व्यवस्था के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। परंपरा के अनुसार, जब सात पड़हा और 21 पड़हा के स्तर पर किसी विवाद का समाधान नहीं हो पाता है, तब 40 पड़हा के लोगों का जुटान होता है। सामूहिक विचार-विमर्श के बाद विवादों के समाधान के लिए निर्णय लिया जाता है। यही वजह है कि मुड़मा जतरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था, एकता और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का भी प्रतीक है।

आधुनिकता के दौर में भी बची हुई है जतरा की पहचान

कई सौ वर्षों से आयोजित हो रहा मुड़मा जतरा समय के साथ बदलता रहा है, लेकिन इसकी मूल पहचान आज भी बरकरार है। पहले के समय में ढिबरी की रोशनी में दुकानें सजती थीं और लोग पारंपरिक तरीके से मेले का आनंद लेते थे। आधुनिक सुविधाओं और बदलते दौर के बावजूद जतरा में पारंपरिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत का महत्व आज भी कायम है। यही इसकी विशिष्ट पहचान है, जो हर साल लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। मुड़मा जतरा धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन के साथ-साथ बड़े व्यापारिक मेले के रूप में भी अपनी पहचान रखता है। आयोजकों के अनुसार, जतरा में हर साल करीब तीन हजार छोटी-बड़ी दुकानें लगती हैं। इस वर्ष दो दिनों के दौरान पांच लाख से अधिक लोगों के पहुंचने की संभावना जताई गई है। आयोजकों का अनुमान है कि जतरा के दौरान करीब 20 से 25 करोड़ रुपये का कारोबार हो सकता है। मेले में विभिन्न प्रकार की दुकानें लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।

बुधवार को जुटेंगे विभिन्न पड़हा के लोग

जतरा के दूसरे दिन आज बुधवार को विभिन्न पड़हा के लोग पारंपरिक प्रतीक चिह्नों और वाद्य यंत्रों के साथ जतरा स्थल पहुंचेंगे। 40 पड़हा के लोगों के जुटान से आयोजन की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता और अधिक बढ़ेगी। इस दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों और आदिवासी संस्कृति की अनूठी झलक देखने को मिलेगी। जतरा को लेकर प्रशासन की ओर से सुरक्षा और यातायात व्यवस्था के व्यापक इंतजाम किए गए हैं, ताकि यहां पहुंचने वाले लोगों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। ऐतिहासिक मुड़मा जतरा एक बार फिर आदिवासी समाज की परंपरा, आस्था, संस्कृति और सामाजिक एकजुटता का संदेश दे रहा है।

Tags - Mudma Jatra Tribal Culture Tradition mandar