जेब अख्तर
आप झारखंड के किसी भी बड़े जनआंदोलन में चले जाइए। सरना धर्म कोड की मांग को लेकर निकले जुलूस में, पेसा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की रैली में, 1932 के खतियान आधारित स्थानीय नीति के समर्थन में हुए प्रदर्शन में, या भूमि अधिग्रहण या विस्थापन के खिलाफ आयोजित सभा में। इन आंदोलनों के मुद्दे अलग-अलग हैं, संगठन भी अलग हैं, नेतृत्व भी बदलता रहता है। लेकिन एक चीज़ अक्सर समान दिखाई देती है- भीड़ में कहीं न कहीं दिशोम गुरु शिबू सोरेन की तस्वीर, उनका नाम या उनके संघर्ष का कोई प्रसंग।
यह केवल श्रद्धांजलि का भाव नहीं है। यह उस राजनीतिक और सामाजिक विरासत की मौजूदगी है, जिसे शिबू सोरेन ने पांच दशक से अधिक लंबे सार्वजनिक जीवन में गढ़ा। सवाल यह नहीं है कि उनकी तस्वीर क्यों दिखाई देती है; असली सवाल यह है कि आख़िर ऐसा क्या है कि उनके जीवन में उठे कई सवाल आज भी झारखंड के आंदोलनों के केंद्र में बने हुए हैं? इस सवाल का उत्तर खोजने के लिए हमें शिबू सोरेन को केवल पूर्व मुख्यमंत्री या किसी राजनीतिक दल के संस्थापक के रूप में नहीं, बल्कि झारखंड आंदोलन के उस चेहरे के रूप में देखना होगा, जिसने संघर्ष की भाषा को आकार दिया।

सिर्फ राज्य नहीं, मुद्दों की राजनीति गढ़ी
झारखंड आंदोलन को प्राय: अलग राज्य की मांग तक सीमित कर दिया जाता है। जबकि यदि शिबू सोरेन के शुरुआती भाषणों, आंदोलनों और जनसभाओं को देखें, तो पाएंगे कि उनकी चिंता केवल एक नए राज्य के निर्माण की नहीं थी। वे बार-बार जल, जंगल, जमीन, स्थानीय संसाधनों पर अधिकार, आदिवासी अस्मिता, विस्थापन और सांस्कृतिक पहचान की बात करते थे।
यही कारण है कि वर्ष 2000 में झारखंड राज्य बनने के बाद भी उनके द्वारा उठाए गए अधिकांश प्रश्न समाप्त नहीं हुए। राज्य बन गया, लेकिन भूमि अधिग्रहण के विवाद बने रहे। खनन और विस्थापन के सवाल बने रहे। स्थानीय नीति पर बहस जारी रही। सरना धर्म कोड की मांग बनी रही। पेसा कानून को पूरी तरह लागू करने की मांग भी लगातार उठती रही। दूसरे शब्दों में कहें तो, शिबू सोरेन का आंदोलन किसी एक राजनीतिक लक्ष्य पर समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उसने ऐसे प्रश्न खड़े किए जो आज भी झारखंड के सार्वजनिक जीवन का हिस्सा हैं।
एक व्यक्ति नहीं, संघर्ष की भाषा
हर जनआंदोलन केवल नारों से नहीं चलता। उसे एक ऐसी भाषा चाहिए होती है, जिससे लोग अपनी पीड़ा और अपने अधिकारों को व्यक्त कर सकें।
झारखंड में यह भाषा काफी हद तक शिबू सोरेन और उनके समकालीन आंदोलनकारियों ने विकसित की। "जल-जंगल-जमीन", "झारखंडी अस्मिता", "स्थानीय अधिकार", "विस्थापन", "मूलवासी", "स्वशासन", ये केवल राजनीतिक शब्द नहीं रहे, बल्कि सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन गए।
आज यदि कोई संगठन पेसा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग करता है, तो वह भी स्थानीय स्वशासन की बात करता है। यदि कोई समूह 1932 के खतियान आधारित स्थानीय नीति की मांग उठाता है, तो उसके पीछे भी स्थानीय अधिकार का तर्क होता है। यदि सरना धर्म कोड की मांग उठती है, तो उसके केंद्र में सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न होता है। ये अलग-अलग आंदोलन हैं, लेकिन इनके भीतर एक साझा वैचारिक धारा दिखाई देती है। यही वह धारा है, जिसे शिबू सोरेन ने दशकों तक मजबूत किया।

आंदोलन को सिर्फ आदिवासी दायरे तक नहीं रखा
दिशोम गुरु की राजनीति की एक विशेषता यह भी रही कि समय के साथ उन्होंने झारखंड आंदोलन को केवल आदिवासी समाज तक सीमित नहीं रहने दिया। उनके साथ बिनोद बिहारी महतो, ए. के. राय और अनेक अन्य नेताओं ने भी यह समझ विकसित की कि झारखंड का प्रश्न केवल जातीय पहचान का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय न्याय का भी प्रश्न है। इसी कारण झारखंड आंदोलन में आदिवासी समाज के साथ-साथ सदान, मजदूर, खनिक, किसान और अन्य स्थानीय समुदाय भी जुड़े। यह व्यापक सामाजिक आधार ही आगे चलकर झारखंड आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बना।
आज भी जब कोई जनसंघर्ष स्थानीय संसाधनों या क्षेत्रीय अधिकारों की बात करता है, तो उसमें केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि अनेक सामाजिक समूह शामिल दिखाई देते हैं। यह उस राजनीतिक विस्तार का परिणाम है, जिसकी नींव आंदोलन के शुरुआती वर्षों में रखी गई थी।
क्यों हैं दिशोम गुरु प्रतीक
राजनीतिक समाजशास्त्र में एक शब्द है, 'सामूहिक स्मृति', इसका अर्थ है कि कोई व्यक्ति केवल इतिहास की किताबों में नहीं रहता, बल्कि समाज की साझा विरासत में जीवित रहता है। शिबू सोरेन की मौजूदगी को इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
जब किसी आंदोलन में उनकी तस्वीर उठाई जाती है, तो उसका अर्थ केवल किसी नेता को याद करना नहीं होता। वह उस पूरे संघर्ष की निरंतरता का संकेत भी होता है, जो जल, जंगल, जमीन और सम्मान के सवालों से जुड़ा रहा है। यही कारण है कि अलग-अलग संगठनों के आंदोलन में भी उनका नाम दिखाई देता है, भले ही उनकी राजनीतिक विचारधारा या संगठन अलग क्यों न हों।

विरासत का सबसे बड़ा अर्थ
किसी नेता की विरासत केवल उसकी सरकारों या पदों से तय नहीं होती। कई नेता बड़े पदों पर रहते हैं, लेकिन समय के साथ सार्वजनिक स्मृति से लगभग गायब हो जाते हैं। इसके विपरीत कुछ ऐसे भी नेता होते हैं, जिनका प्रभाव चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर समाज की चेतना का हिस्सा बन जाता है।
झारखंड में शिबू सोरेन का प्रभाव काफी हद तक इसी श्रेणी में दिखाई देता है। उनकी प्रासंगिकता इस बात में नहीं है कि वे कितनी बार मुख्यमंत्री बने, बल्कि इस बात में है कि उनके द्वारा उठाए गए प्रश्न आज भी सार्वजनिक बहस के केंद्र में हैं।
यह प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी
यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी भी आंदोलन की विरासत तभी तक जीवित रहती है, जब तक उसके मूल प्रश्न समाज के सामने बने रहते हैं। यदि झारखंड में स्थानीय अधिकार, प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण, आदिवासी और मूलवासी पहचान, सांस्कृतिक संरक्षण और विस्थापन जैसे प्रश्न भविष्य में भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने रहते हैं, तो शिबू सोरेन का नाम भी इन बहसों में बना रहेगा।
हो सकता है आने वाली पीढ़ियां उन्हें अलग दृष्टि से देखें, उनकी आलोचना भी करें, उनके निर्णयों पर नए सवाल भी उठाएँ। यह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन इतिहास का मूल्यांकन केवल विवादों से नहीं होता; वह यह भी देखता है कि किसी व्यक्ति ने समाज के सामने कौन-से प्रश्न स्थायी रूप से खड़े किए। शायद इसलिए झारखंड के आंदोलनों में शिबू सोरेन की तस्वीर केवल एक चित्र नहीं होती। वह एक स्मृति, एक प्रतीक और एक अधूरे संवाद की तरह उपस्थित रहती है। दिशोम गुरु की सबसे बड़ी विरासत शायद यही है कि वे केवल झारखंड आंदोलन के इतिहास का अध्याय नहीं बने। वे उस भाषा का हिस्सा बन गए, जिसमें आज भी झारखंड अपने अधिकार, अपनी पहचान और अपने भविष्य की बात करता है।
