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पाकिस्‍तान यात्रा अंतिम कड़ी : इस्लामी मुल्क से मैं लौट आया अपने देश, जहां न कोई डर और ना ही ख़ौफ़

'हिंदी के वरिष्‍ठ लेखक असगर वजाहत की पाकिस्‍तान यात्रा

अमरीका के गुलाम नहीं रहे तो पाकिस्तान के भी तालिबानी पिछलग्गू नहीं रहेंगे

'तालिबान और भारत : आशंका नहीं संकल्प लेकर फ्रंटफुट पर खेलने का समय!

पाकिस्‍तान यात्रा-11: कराची में ‘दिल्ली स्वीट्स’ की मिठास और एक पठान मोची

'हिंदी के वरिष्‍ठ लेखक असगर वजाहत का सफ़रनामा 'पाकिस्तान

अफ़ग़ान और भारतीय संगीतकारों का सदियों पुराना नाता

1970 का दशक अफगान म्यूज़िक इंडस्ट्री का स्वर्णकाल था।आज इनका दुनिया भर में डंका बज रहा है। 

पाकिस्‍तान यात्रा-10: अपने लगाए पेड़ का कड़वा फल आज ‘खा’ रहा है पाकिस्तान

मशहूर लेखक असग़र वजाहत ने पाकिस्तान यात्रा पर केंद्रित यह संस्मरण 2011-12 के दौरान लिखा

Edit-Desk: शरीयत के नाम पर तालिबान को बर्बरता की छूट कैसे!

'''इस्लामी रूह से बंदूक की ताक़त से हुकूमत बिल्कुल नाजायज़ है। क़ुरआन में हुकूमत के संबंध में हुक्म है, अमरहुम शूरा बैनहुम। यानी हुकूमत की बुनियाद अवाम की रज़ामंदी है।

कौन थीं लारा लप्पा गर्ल, जिन्होंने की पांच शादी

आज़ादी के बाद जब भारतीय सिनेमा बंटवारे की त्रासदी से उभरने और सामाजिक वर्जनाओं को तोडऩे की कोशिश कर रहा था, फ़िल्म-मेकर रूप के.शौरी की फ़िल्म "एक थी लड़की" सिनेमाघरों में पहुंची और इसके एक गाने 'लारा लप्पा लारा लप्पा लाई रखदा' ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक धूम

अमृत राय सिर्फ़ प्रेमचंद के सुपुत्र ही नहीं थे

प्रेमचंद ने नब्बे वर्ष पहले लिखा था; "हमें अख्तियार है, हम गऊ की पूजा करें, लेकिन हमें यह अख्तियार नहीं है कि हम दूसरों को गऊ-पूजा के लिए बाध्य कर सकें। हम ज्यादा से ज्यादा यही कर सकते हैं, कि गौमांस -भक्षियों की न्यायबुद्धि को स्पर्श करें। फिर मुसलमानों

अफगानिस्तान पर गंभीरता से विचार करें, लेकिन हिंदुस्तानी तालिबान पर भी सोचें

''दोनों की सोच यही है कि राजनीति धर्मकेंद्रित हो, जिसे  अंग्रेजी में थिओक्रेसी कहते हैं।

पाकिस्‍तान यात्रा-9: कराची के रत्‍नेश्‍वर मंदिर में कोई गैर-हिंदू नहीं जा सकता

हिंदी के वरिष्‍ठ लेखक असगर वजाहत 2011 में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के जन्म शताब्दी समारोह में शिरकत करने पाकिस्तान गए थे।

कैसे याद न आएं दुष्‍यंत- मत कहो, आकाश में कुहरा घना है

'हो गयी है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए   

हिन्दी में शोधपत्र लिखनेवाले पहले शोधार्थी थे रामकथा के मर्मज्ञ फादर कामिल बुल्के

'रामकथा और विकास पर शोध प्रबंध लिखकर उन्हों ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से डी.फिल. की डिग्री ली थी।

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