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BIHAR : बिहार में जहां रुके थे महात्मा गांधी और कस्तूरबा, यहीं से हुई थी चंपारण सत्याग्रह की शुरूआत

बिहार में जहां रुके थे महात्मा गांधी और कस्तूरबा, यहीं से हुई थी चंपारण सत्याग्रह की शुरूआत

डेस्क:
गांधी जी (Mahatma Gandhi) के भारत वापस लौटने के 2 साल बाद यानि सन 1917 में भारत में सत्याग्रह (satyagraha Movement)  की शुरुआत की गई। इस पहल को सबसे पहले बिहार के चंपारण जिले में किसानों के हक के लिए शुरू किया गया था। बापू जब बिहार आए तो वो बेतिया जिला के 74 किलोमीटर दूर है भितिहरवा आश्रम (Bhitiharwa Ashram) में रूके थे। जहां उन्होंने अपने कपड़ों को त्यागा था। यहां उनके साथ उनकी पत्नी कस्तूरबा भी साथ थी।

कई चीजों को आज भी सरकार द्वारा रखा सुरक्षित
गांधी जी जब यहां रहा करते थे, उस समय उनके द्वारा इस्तेमाल की गई कई चीजों को आज भी सरकार द्वारा आज भी सुरक्षित रखा गया है। सरकार द्वारा बनाए गए आश्रम में सभी चीजों के सुरक्षित रखा गया है। इनमें चक्की, टेबल, घंटी इत्यादि शामिल हैं। दरअसल, अंग्रेज किसानों का नील की खेती के नाम पर शोषण करते थे। राज कुमार शुक्ल जानते थे एक महात्मा गांधी ही है, जो किसानों को इससे मुक्ति दिला सकते हैं। फिर राज कुमार शुक्ल के कई बार अनुरोध पर गांधी जी 15 अप्रैल, 1917 को चंपारण आए। यहां गांधी जी को उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी ने पूरा सहयोग किया।

कस्तूबा गांधी बच्चों को पढ़ाने लगी
राज कुमार शुक्ल के अनुरोध पर जब बापू बिहार पहुंचे तो उन्होंने देखा कि शिक्षा के साथ स्वास्थ्य का भी अभाव दिखा। महिलाओं और बच्चों की स्थिति भी ठीक नहीं थी। कुल मिलाकर लोगों में विश्वास की बेहद कमी थी। महिलाओं और बच्चों के बेहतरी का जिम्मा कस्तूरबा गांधी ने लिया। यहां गांधी जी ने योजना बद्ध तरीके से स्कूलों की स्थापना शुरू की। उसी में एक स्कूल भितिहरवा में खोला गया, जिसमें खुद कस्तूबा गांधी बच्चों को पढ़ाने लगी।

अच्छी पढ़ाई के लिए बच्चों के जाना पड़ता है बाहर
जब वहां स्थानीय लोगों से पूछताछ की गई कि सत्याग्रह के वक्त बापू ने जिले को जो सुविधा दिलाई थी उसका क्या हाल है तो लोगों ने कहा कि गांधी जी द्वारा अस्पताल तो है पर बेहतर इलाज की सुविधा नहीं है। लोगों को बेहतर इलाज के लिए गोरखपुर या पटना जाना पड़ता है। इसके बाद विद्यालय जहां बच्चों को कस्तूरबा गांधी पढ़ाया करती थी। विद्यालय के भवन को सरकार ने बेहतर बनाया है। लेकिन आसपास के लोगों का कहना है कि उस विद्यालय में अच्छी पढ़ाई नहीं होती है। इस वजह से बच्चों को बगल के शहरों में पढ़ने के लिए जाना पड़ता है।


ब्रिटिशों द्वारा किसानों के साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ हुआ चंपारण सत्याग्रह 
चंपारण सत्याग्रह को ब्रिटिशों द्वारा किसानों के साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ किया गया था। ब्रिटिश शासन के समय चीन, ब्रिटेन एवं यूरोप में निर्यात करने के लिए अफीम एवं नील यानि इंडिगो को व्यवसायिक रूप से उगाने के लिए किसानों को मजबूर किया जाता था। इस तरह की फसल में ज्यादा पानी की आवश्यकता होती थी और फसलों के साथ – साथ मिट्टी भी ख़राब हो जाती थी। जिसके कारण किसान अपनी जमीन पर चांवल एवं दालें जैसी जरुरत की खाद्य फसलें नहीं उगा पा रहे थे। किसानों ने इसका विरोध किया, किन्तु ब्रिटिशों को अफीम के व्यवसाय से अधिक लाभ हो रहा था इसलिए उन्होंने किसानों की मांग न मानते हुए उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर किया।